जैसे को तैसा bal kahani

जैसे को तैसा balkahani

 जंगल के पास एक गांव था। उस गाव के पास ही से एक नदी बहती थी । उस नदी के किनारे एक बरगद का वृक्ष था । इसी वृक्ष पर एक चिड़िया अपना घोंसला बनाकर रहती थी । चिड़िया बहुत मेहनती व ईमानदार थी। स्वभाव से वह बहुत शांत थी तथा हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहती थी।  वह रोज सुबह सूरज के निकलने पर अपने घोसले से निकलती और भोजन की खोज में गांव भर में चक्कर लगाती। जैसे को तैसा balkahani

जैसे को तैसा bal kahani
जैसे को तैसा bal kahani

कभी मुन्नी के घर से तो कभी सरोजा के आंगन से चावल चुन कर लाती, और अपने बच्चों को खिलाती। बच्चे अभी छोटे थे, तथा उतना नहीं जानते थे। इसके अलावा चिड़िया घास के तिनके ला कर अपने घोसले की मरम्मत भी करती रहती । ताकि घोंसला कमजोर ना होने पाए। इसके बाद उसके पास जो समय बचता उसे वह दूसरे पशु पक्षियों की सहायता में व्यतीत करती।

कुछ दिनों बाद एक कौवा उसी पेड़ पर  रहने के लिए आया । चिड़िया ने अपनी प्रसन्नता से उसका स्वागत किया, पर कौवा स्वभाव से बड़ा ही दुष्ट प्रकृति का था । वह आलसी और कामचोर होने के साथ-साथ लालची भी था । उसे दूसरों को कष्ट पहुंचाने में बड़ा आनंद आता था।

दुष्ट कौवा

 एक बार की बात है चिड़िया दाने की खोज में गांव की ओर गई हुई थी । उसके छोटे-छोटे बच्चे घोसले में ही खेल रहे थे।

 कौवे ने जब बच्चों को अकेला देखा तो उस से रहा नहीं गया, और वह चिड़िया के घोसले में पहुंच गया । बच्चों को चोट मारकर तंग करने लगा। चिड़िया के बच्चे घबराकर ची ची करके रोने लगे। इतने में ही चिड़िया उड़ कर आती दिखाई दी । कौवा उड़ कर तुरंत ही भाग गया। चिड़िया ने जब बच्चों को रोते देखा तो रोने का कारण पूछा । बच्चों ने रोते हुए सारी बात कह सुनाई। सब सुनकर चिड़िया परेशान हो गई ।

 कौव्वे के आने पर जब चिड़िया ने उसको पूछा तो वह गुस्सा होकर चिड़िया को बुरा भला कहने लगा। चिड़िया चुपचाप अपने घोसले में आ गई।

इस घटना के दो ही दिन बाद की बात है, चिड़िया को पप्पू के घर से एक रोटी मिल गई । रोटी पाकर चिड़िया बहुत खुश हुई। जैसे ही रोटी लेकर वह अपने घोसले में पहुंची। वैसे ही कौवे ने छापा मारकर रोटी  छिनकर दूसरे वृक्ष पर जा पहुंचा। वहां बैठ कर आराम से रोटी खाने लगा, चिड़िया दुखी हो कर रोने लगी ।

 कौवा रोज ही कोई ना कोई उपाय कर चिड़िया को तंग करने लगा ।

एक दिन जब चिड़िया अपने बच्चों को उड़ना सिखाने के लिए ले गई । कौवा ने चिड़िया को जाते देख कर उसका घोसला अपनी चोंच और पैरों से चीख चीख कर तहस-नहस कर डाला । लौटकर चिड़िया अपने घोसले की हालत देखकर घबरा गई । और उसने हिम्मत नहीं हारी । और तुरंत ही घोसले की मरम्मत करने में जुट गई। जल्दी ही उसने अपना घोंसला पहले की तरह ही मजबूत बना लिया।

किसी ने ठीक कहा है कि दुष्ट प्रकृति के प्राणी का साथ नहीं करना चाहिए। इस बात को अच्छी तरह से समझ लिया था । जब चिड़िया के सामने दो ही उपाय थे एक तो यह कि वह स्वयं उस पेड़ को छोड़कर कहीं और जाकर अपना घोंसला बना ले, या कौवे को ही वहां से भगा दे । फिर चिड़िया ने सोचा कि यदि वह किसी और पेड़ पर भी जाकर रहती है, तो कौवा वहां पर पहुंचकर भी उसे तंग करेगा । अतः उस से कौवे को ही सबक सिखाने के बारे में सोचा।

 वह हाथी दादा के पास पहुंची और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनाई । हाथी दादा चिड़िया को बहुत मानते थे । क्योंकि एक बार उस ने हाथी दादा की सूंड में छुपे हुए कांटे को अपनी पैनी चौच से खींचकर निकाल दिया था । हाथी दादा तुरंत चिड़िया को अपनी पीठ पर बैठाकर चल पड़े । पेड़ के पास पहुंच कर उन्होंने देखा कि कौवा आराम से सो रहा था।

अच्छा मौका जानकर हाथी दादा ने तुरंत कौवे को अपनी सूंड में जकड़ लिया । और धमकाया कि यदि वह चिड़िया को तंग करना नहीं छोड़ेगा ।  तो उसे अपने पैरों के नीचे कुचल कर मार डालेगा, अब तो कौवा बहुत घबराया उसे आंखों के सामने अपनी मौत दिखाई देने लगी। गिड़गिड़ा कर हाथी दादा से माफी मांगने लगा और उसने यह वचन दिया कि वह यह गांव छोड़कर चला जाएगा । और फिर कभी चिड़िया को तंग नहीं करेगा । हाथी दादा ने उसे छोड़ दिया और कौवा तुरंत ही वहां से नौ दो ग्यारह हो गया । किसी ने ठीक ही कहा है।

लातों के भूत बातों से नहीं मानते।

लेखक_ डॉ. अर्चना पांडेय  (इलाहाबाद)

जैसे को तैसा balkahani

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