बुढी काकी, प्रेमचंद की कहानी

बुढी काकी की कहानी:बुढ़ापा और बचपन दोनों ही एक समान होता है। बूढी काकी के सभी अंग जवाब दे चुके थे, उनके पतिदेव और बेटा तरुण दोनों स्वर्गवासी हो चुके थे।

सारी संपत्ति उन्होंने अपने भतीजे के नाम कर दी थी, और उसी के साथ रहती थी। संपत्ति नाम कराते समय उनके भतीजे ने उनसे बहुत सारे वादे किए थे और बहुत बड़ी-बड़ी बातें की थी, बाद में बूढ़ी काकी को दो वक्त का खाना भी ठीक से नहीं मिलता था।

बूढ़ी काकी

बूढी काकी
मुंशी प्रेमचंद की कहानी बुढी काकी

मुंशी प्रेमचंद की कहानी बूढ़ी काकी

यह सब देख कर वह खूब रोती थी। उनका भतीजा बुद्धि राम स्वभाव का सरल था, और उतनी ही तेज थी उसकी पत्नी रूपा, मां-बाप का ऐसा हाल देखकर बच्चों का भी बूढ़ी काकी के साथ यही बर्ताव था। बूढी काकी कई बार क्रोध में आकर उनको गाली देती तो रूपा सुन लेती तो उनको बहोत मार और गालिया देती उसी कारणवश वह शांत रहना ही उचित समझती थी।

बूढी काकी से छोटी लड़की लाडली का लगाव,बूढ़ी काकी प्रेमचंद की कहानी

पूरे परिवार में बूढ़ी काकी को जिससे लगाव था। वो थी लाडली, बुध्धिरम की सबसे सबसे छोटी बेटी।  लाडली अपने दोनों भाइयो के डर से अपने हिस्से की मिठाई बूढी काकी के साथ बैठकर खाती थी।

बूढ़ी काकी अपनी कोठरी पर थी। बाहर जश्न मनाया जा रहा था। बुद्धि राम के सबसे बड़े बेटे मुखराम का तिलक था। खूब खुशबू भी आ रही थी और मेहमान बाहर बैठे बातें कर रहे थे। बूढी काकी यहाँ भूखी बैठी थी। आज तो उन्होंने रोया भी नहीं, क्योंकि वह अपशगुन हो जाता। क्योकि उन को खाना देने वाला कोई नहीं था। और आज लाडली भी उनके पास नहीं गई।

वह अलग-अलग खाने की कल्पना करने लगी, और यह सोचते हुए वह कढ़ाई के पास जाकर बैठ गई। रूपा अपने काम में बहुत व्यस्त थी। वह कभी यहां जाती तो कभी वहां जाती। गला प्यास से सुख रहा था। किंतु वह एक मिनट भी टाइम नहीं मिला, और क्रोध न जताया, नहीं तो पड़ोसी बोलते कि इतने में ही उबल गई।

बुढी काकी की गुस्सैल बहु रूपा

इन सबके बीच उसने बूढ़ी काकी को कढ़ाई के पास बैठे देखा तो उसे क्रोध आ गया, उन्हें दोनों हाथों से झटक कर बोली,” ऐसे पेट में आग लगे पेट है की गोदाम, झोपड़ी में बैठे रहने से क्या दम घुटता था। अभी तक मेहमानों ने भी नहीं खाया, और भगवान को भोग नहीं लगाया, तब तक धैर्य ना हो सका?

यहाँ लोगो को दिखाने के लिए आई है क्या? खाने को मै खाने को नहीं देती क्या इधर उधर कुत्ते की तरह मुंह मारती फिरती हो, चुड़ैल ना मरे न खाना छोड़े, हमारा नाम बेचने पर लगी है, नाक कटवा कर ही दम लेगी।

इतनी ठुसती है ना जाने कहां भस्म हो जाता है। भला चाहती हो तो जाकर कोठरी में बैठो, जब घर के लोग खाना खा लेंगे तब तुम्हें भी मिलेगा! तुम कोई देवी नहीं हो की तुम्हे पहेले भोग भोजन करके तुम्हारी पूजा की जाए।

बूढी काकी बेचारी

बूढ़ी काकी बिना कुछ कहे रेंगती हुई अंदर चली गई। और बिचारी कर भी क्या सकती थी, उन्हें रूपा पर क्रोध नहीं था, बल्कि वह सोच रही थी कि जब बाहर वाले नहीं खाना खाया तो वह कैसे खा लेगी, इतनी जल्दबाजी क्या थी, यह सोचकर बहुत देर तक बैठे रही इस इंतजार में कि जब कोई बुलाएगा तभी जाऊंगी।

बहुत देर हो चुकी थी वह सोचे अब तक तो खा चुके होंगे सब और वह फिर से बाहर आई परंतु मेहमान अभी अभी बैठे थे। वह बोलने लगे अरे या बुढ़िया कौन है? यहां कहां से आ गई देखो किसी को छू ना दे,

यह देखकर बुद्धि राम ने पूरी की थाल पटक दी और बूढ़ी काकी को एक अंधेरी कोठरी में धम से पटक दिया। अब तक सभी ने भोजन कर लिया था पर बूढ़ी काकी को कोई नहीं पूछा! लाडली बूढ़ी काकी से बहुत प्यार करती थी पर वह उनके पास अपनी मां के डर से जाना सकी, उसके मन में कई बातें आ रही थी।

और बूढ़ी काकी के साथ किया वर्ताव भी अच्छा नहीं लग रहा था। इसलिए वह अपने हिस्से की पूरी ना खाकर गुड़िया की पिटारी में रखी थी और वह सोचकर कि काकी यह देख कर खूब खुश हो जाएगी।

बूढी काकी, से लाडली का प्यार

रूपा आँगन में सो रही थी। जब लाडली को यकीन आया कि वह सो गई है तब हिम्मत करके लाडली काकी के पास गयी। काकी की उम्मीद अब तक तो मिट चुकी थी। और जो कुछ भी हुआ वह उनके दिमाग में आ रहा था।

उतने में ही एक आवाज आई काकि उठो मैं पुड़िया लाई हूं, उन्होंने लाडली को गोद में बैठा लिया और झटपट सारी पुड़िया खाली पर उनका पेट ना भरा उन्होंने लाडली को और पूरी लानेको कहा” लाडली ने कहा,” अम्मा सोती है जगाऊंगी तो मारेंगी। काकि अधीर हो गई थी, और उनकी इच्छाएं बढ़ गई थी।

उन्होंने लाडली से कहा,” मेरा हाथ पकड़ कर वहां ले चलो जहां मेहमानों ने भोजन किया हो और इनका झुटा जहा फैका हो, लाडली काकी को झूटे के पास लेजाकर बैठा दिया। काकि सबके झूटे पत्ते चाटने लगी। उन्हें पता था कि यह उचित नहीं है। लेकिन वह भूख से व्याकुल थी।

लाडली का न दिखना

अचानक रूपा की आंख खुलती है। और उसे लाडली कहीं नजर नहीं आती। रूपा लाडली को इधर-उधर देखने लगती है। तब उसे झूठों बर्तनों के पास खड़ी दिखती है। और बूढ़ी काकी उन्ही बर्तनों के पास बैठी दिखाई देती हैं।

यह देख कर रूपा का दिल सन्न हो गया। उसे अपनी निर्दयता का ज्ञान हुआ, उसे समझ आ चुका था कि वह जिसकी बदौलत उसने इतनी दुर्गति की।

रूपा उठी और पूरी थाली सजाकर बूढ़ी काकी के पास जाकर बोली,”काकी उठो यहाँ से और भोजन कर लों मुझसे बड़ी भूल हुई है बुरा न मानना, परमात्मा  से प्रार्थना कर दो कि वह मेरा अपराध क्षमा करें।

बुढी काकी

बूढी काकी सब कुछ भुला कर सिर्फ खाना खाने लगी, और वही रूपा वह स्वर्गीय दृश्य को देख रही थी।

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