यदा यदा ही धर्मस्य-yada yada hi dharmasya

श्रीमदभगवतगीता के बारे में यहाँ पे पांच चुनिन्दा यदा यदा ही धर्मस्य जैसे श्लोको के अर्थ और श्लोक बताये है जो आपको पसंद आएगा ।

|| ॐ श्री कृष्णाय नम: ||

यदा यदा ही धर्मस्य
yada yada

श्रीमद भगवतगीता -यदा यदा ही धर्मस्य

yada yada hi dharmasya hindi meaning

श्रीमदभगवतगीता  मानव जीवन से सबंधित ज्ञान का एक संकलन है। जो भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को सुनाई थी। जब महाभारत के युद्ध में अर्जुन विचलित होकर अपने कर्तव्य से विमुख हो रहे थे। गीता का उपदेश आज से लगभग सात हजार साल पहले सुनाई गया था।

यह गीता उपदेश कुरुक्षेत्र के रण में युद्ध के दौरान रविवार के दिन सुनाया गया था, और उस दिन ‘एकादशी’ का दिन था। इसलिए एकादशी के दिन को पवित्र और महत्व दिया जाता है। पुरानो के अनुसार यह गीता उपदेश पैतालीस मिनट में सुनाई गयी थी। और यह गीता ज्ञान कर्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्तव्य सिखाने के लिए और आने वाले पीढियों को धर्म ज्ञान सिखाने के लिए सुनाया गया था। श्रीमदभगवतगीता में कुल अठारा अध्याय है।

जिसमे ७०० श्लोक है। जिसमे मुख्य रूप से ज्ञानभक्ति, और कर्म योग मार्गो की विस्तार से व्यख्या की गई है। और इन मार्गो पे चलने से व्यक्ति निश्चित ही परम पद अर्थात जीवन में सफलता का अधिकारी बन जाता है। इस गीता उपदेश को उस कुरुक्षेत्र में अर्जुन के आलावा सिर्फ धुतराष्ट और संजय ने भी सुना था।

श्रीमदभगवतगीता हमारा महाभारत का ही एक हिस्सा है। शांतिपर्व अध्याय का ही हिस्सा है। हिन्दुओ का पवित्र ग्रन्थ श्रीमदभगवतगीता है। भगवत गीता का प्रमुख सर यह भी है की मनुष्य को किसी भी स्थिति में घबराना नहीं है। ना ही अपने कर्तव्य से विमुख होना चाहिए क्योकि अंत में जित सत्य की ही होती है। और परिवर्तन ही इस संसार का नियम है।

यदा यदा ही धर्मस्य- श्रीमदभगवतगीता श्लोक 

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम ||

परित्राणाय साधुना विनाशाय च दुष्कृताम् |

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

श्रीमद भगवतगीता अध्याय – 8  श्लोक – 7 / 8

हे… भरतवंशी अर्जुन ! जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृध्धि होती है, तब तब मै अपने आपको (साकार रूप से ) प्रकट करता हु। साधुओ (भक्तो) की रक्षा करने के लिए, पापकर्म करनेवालो का विनाश करने के लिए, और धर्म की भलीभाती स्थापना करने के लिए, में युग-युग में प्रकट हुआ करता हु।

भगवान श्री क्रिष्ण जब जब संसार में अधर्म बढ़ता है। हे पार्थ ! जब साधुओ को मुक्त करने का समय आता है, जब अधर्मियों का अधर्म बहोत ही बढ़ जाता है। तब धर्म की स्थापना करने के लिए में स्वयं जन्म लेता हु।

श्रीमदभगवतगीता श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोडस्त्वकर्मणि ||

तुम्हे अधिकार है केवल कर्म करने का, फल तो इश्वर के हाथो में है, इसलिए न कर्म से भागना उचित है, ना कर्म से फल की इच्छा रखना उचित है। कार्य पूर्ण रूप से तभी संपन्न होता है, जब उसके बाद जब फल की आशा ना जुडी हो, असफलता से दुखी हो कर जिस का मन नहीं डोलता, वही मनुष्य सफलता का मनोरथ पूर्ण कर पाता है। वही बार बार सफलता ही प्राप्त करता है। कार्य सफल हो या निष्फल यदि उस कार्य के पास फल की आशा जुडी है, तो मनुष्य को हानी ही होती है।

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ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ||

सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते ||

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः |

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ||

हल्की आशा कामना है। और कामना का स्वभाव! के वो कभी भी पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं हो सकता, असंतोष का कारन होता है। क्रोध के चलते और इशी क्रोध से अहंकार और मोह जन्म लेता है। यदि सतज्ञान पाने की इच्छा ना हो तो सद्ज्ञान पाने की बुध्धि कहा से आएगी।

और बुध्धि के जाने पर अनुचित प्रकार के कार्य होने लगते है। अनुचित कार्य करनेवाला अपराधी होता है। और अपराधी दंड का पात्र होता है। समाज में तिरस्कार का पात्र होता है। अपनी बुध्धि को स्थिर कर सवयम् को आत्माजाने सारे मिथ्या बन्धनों को तोड़ दो। फल की आशा का त्याग करके कर्म करते रहो।

श्रीमदभगवतगीता श्लोक

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

जगत के सारे धर्मो को त्याग कर तुम मेरी शरण स्वीकार करो पार्थ ! में ही भूमि हु, मै ही आकाश हु, मै सूर्य से भी पुरातन हु, में किसी वृक्ष पर किसी खिली कली से भी नया हु, मै ही स्वर्ग और नरक को धारण करने वाली शक्ति हु।

श्रीमदभगवतगीता श्लोक

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।

दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं हीरचापलम् ॥

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।

भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥

बिना कारन तथा स्वार्थ के हेतु हिंसा करना अधर्म है पार्थ ! अहिंसा ही वास्तव में परम धर्म है। उसके साथ सत् क्रोध का ना होना, त्याग, मन, में शांति निंदा ना करना, दया भाव रखना, दुखो के प्रति आकर्षण न होना, और आकारण कार्य ना करना।

तेज, क्षमा, धैर्य, शरीर की शुध्धता धर्म से दो राह न करना, और अहंकार का ना होना, इन सभी गुणों को सत्व गुण या दैवीय सम्पति कहा जाता है। पार्थ ! इसीसे मनुष्ट परमात्मा की अर्थात मेरी भक्ति कर पाता है। जो मेरी भक्ति करता है वो इस जीवन के कर्तव्यों का वहन करता है। धर्म की स्थापना करता है।

पर कर्म के फलो की इच्छा किये बिना उनकी आशा त्याग कर अपना जीवन जीता है। उसे में इस जनम में संतोष देता हु। तथा मृत्यु के पश्चात् अपने में स्थान देता हु ।

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