akbar birbal ki kahani, अकबर बीरबल की कहानी इन हिंदी

akbar birbal ki kahani: दोस्तों जब भी कहानिया की बात आये तब अकबर बीरबल की कहानिया भूल ही नहीं सकते बच्चो को अकबर बीरबल की कहानिया बहोत पसंद आती है , यहाँ पे हमने कुछ कहानिया रखी है आशा करता हु आप को बहोत ही पसंद आएगी.

अकबर बीरबल की मझेदार कहानिया- akbar birbal ki kahani 

akbar birbal ki kahani
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(1) लड़ाई में जीत किसकी ?


एक दिन कहीं संग्राम में जाने के लिये तैयार होकर बादशाहने बीरबल से पूछा”अच्छा बीरबल ! मैं तुमसे पूछता हु कि आज की लड़ाई में किसकी जीत होगी?”

बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथिवीनाथ ! यह बात मैं यहाँ से नहीं बतला सकता। हाँ युद्ध का मैदान देखकर आपको बतला दूंगा।”

बादशाह जब युध्ध्भूमि में पहुंचे तो फिर वही बात बीरबल से पूछा ।

बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथिवीनाथ ! जित तो आपकी ही होने वाली है।” बादशाह बोले-“ये बात तुम किस आधार पे कह रहे हो?

बीरबल ने कहा “-सरकार ! मैं यह देखके कह रहा हु कि आपका , शत्रु हाथी पर सवार होकर आया है और हाथी एक मनहूस प्राणी है

यहांतक कि वह अपनी सूड से धूल उठाकर अपने ही शरीर पर फेका करता है और आप घोड़ेपर सवार हैं। घोड़ा बहादुर होता है। उसको लोग गाजीमद भी कहते हैं।

बादशाह बीरबल के इस बेहतरीन सोचने की कला से बड़ा आनंद हुए और लड़ाई जित जाने पर उसे इनाम दिया।


(2) महाकाली के ठट्टे


एक दिन बीरबल को डराने के विचार से महाकाली माँ ने अपना हजार मुख वाला विकराल रूप धारण कर रात्रि के समय में उसको दर्शन दिया। बीरबल महामाया को देख हँसते हँसते उनको प्रणाम किया और फिर सन्न मार “गया।

इसका यह हाल देख देवी विचार-मग्न हो गई। उसने मन में विचारा-“पहले तो मेरे ऐसे भयानक स्वरूप को देखकर इसे डरना चाहिये था, सो यह जरा भी भयभीत न हुआ। उल्टा मुझे देखकर हँसा, और तुरत ही गमगीन भी हो गया। इसलिये इसकी मार्मिक बातों का भेद लेना चाहिये।

वह प्रगट होकर बोली-“भक्तवर बीरबल ! तू मुझे देखकर पहले तो हँसा फिर उदास क्यों हो गया।”

बीरबल बड़ी दीनताई से बोला-“मातेश्वरी! आप अन्तरयामिनी हैं, आपसे किसीका कुछ छिपाव नहीं है। फिर भी आपके पूछने पर बिना बतलाये भी अनुचित है। मेरे हँसने का यह सबब है कि आपका दर्शन कर मैं बड़ा आनन्दित हुआ, परन्तु दूसरा कारण मैं नहीं बतलाऊँगा।”

जब देवी ने उसे धीरज देकर अभयदान देने का वचन दिया

तो बीरबल बोला-“हे जगजननी जी! मैं अपने मन में अनुमान कर रहा था कि मुझे केवल दो हाथ एक सिर और एक नाक है और आपको हजार शिर हजार नाक और केवल दो ही हाथ हैं। मैं जोखाम होने पर एक ही नाक को अपने दोनों हाथों से साफ करते करते थक जाता हूँ, फिर जब आपको जुखाम होगा तो आप हजार नाको को केवल दो ही हाथों से कैसे साफ करेंगी।

मुझे इसी चिन्ता ने शोकित कर दिया था। देवी अपने भक्त बीरबल के उत्तर से सन्तुष्ट हुई और उसको आशीर्वाद देती हुई अन्तर्धान हो गई।


(3)  सबसे प्यारी वस्तु

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एक दिन बादशाह जनाने महल में अपने सबसे प्रिय बेगम से कुछ बातें कर रहा था। बात बात में कोई ऐसा विषय आगया जिससे कि वह सिरसे पैर तक बेगम से गुस्सेइल हो गए, और उसे आज्ञा दी कि तुम आज शाम तक महल खाली कर दो । बेगम धीरे से बादशाह के गुस्से को शान्त करने के लिये बहुतेरा प्रयास किया; परन्तु सब निष्फल गया। बादशाह उसी क्रोधावेश में महल से बाहर चले गये। बेगम भय से थरथर काँपने लगी । जब अपने बचाव के लिये बहुत मन को टटोला फिर भी कोई युक्ति न निकाल सकी

तो उसका ध्यान बीरबल की तरफ गया। उसने दासको भेजकर चुपके से बीरबल को महल में बुलवाकर अपना सारा हाल कह सुनाया । बीरबल उसे एक गुप्त परामर्श देकर तुरत महल से बाहर आया और फिर दरबार के कामों को इस ढंगसे मौन होकर करने लगा मानो उसे इसकी कुछ खबर ही नहीं। ___

जब थोड़ा दिन ढलने को बाकी रह गया तो बेगम ने कुछ सामानों के अलग अलग कई गट्ठर बाँधकर बादशाह को बुलवाया। जब वे आये तो बेगम ने बहुत समझाया; परन्तु फिर भी बादशाह का मन पल्टा नहीं।

अकबर बोले-“ अ शाम होने वाली है, समय नहीं है तुम्हारे पास, सूर्यास्त हो रहा है अत एव अपनी सारी सामग्रियों को लेकर जल्दी से महल खाली कर दो।”

बेगम बोली-“स्वामी ! जब आप मुझे त्यागते ही हैं तो मेरी एक अन्तिम प्रार्थना स्वीकार करें। मैं चाहती हूँ कि इस जुदाई के समय मेरे हाथ से एक गिलास शर्बत पान करलें। अब जब मेरा सौभाग्य कहीं फिर से उदय होगा तब न मुझे आपका दर्शन मिलेगा।’ स्त्रियों की मोहनी भी क्या है, बादशाह बेगम के जाल में फंस गया।

बेगम बीरबल से सलाह लेके काम किया

बेगम एक प्याले में खूब अच्छी सराब भर लाई और बादशाह को अपने हाथों से पिला दिया। थोड़ी देर में बादशाह शराब की नशे में ऊंघने लगा। बेगम पहले से ही अपने नौकर को सावधान कर चुकी थी, वे बादशाह को ले जाकर एक पालकी में सुला दिया। फिर बेगम भी एक दूसरी पालकी में सवार होकर बादशाह के सहित अपने पीहर चली गई।

राजा का नींद से जागना

वह बादशाह को एक पलंग पर सुलाकर और स्वयं उसकी पहरेदारी करने लगी। दूसरे दिन जब बादशाह की नींद खुली और नशे का झोका टूटा तो अपने को एक अपरिचित स्थान में पाया।

उन्हें सन्देह हुआ-“क्या मैं स्वप्न देख रहा हूँ?’, बेगम सामने पंखा से हवा दे रही थी

बादशाह ने उससे पूछा-“क्या तुम बतला सकती हो कि मैं इस समय सोया हूँ अथवा जाग रहा हूँ।”

बेगम ने उत्तर दिया-“स्वामीनाथ ! पहले आप सो रहे थे, परन्तु अब सबेरा होने पर आपको निन्द्रा भंग हो गई है।

उठिये हाथ मुँह धोकर नमाज पढ़ लीजिये। बादशाह बोले-“पहले बतलाओ कि यह किसका महल है और हम कहाँ पर आये हुए हैं।”

बेगम ने अपना दोनों हाथ जोड़कर कहा”प्रभु! यह आप की ससुराल यानी मेरे पिता का घर है । मैं भी आपकी आज्ञा पालन करने के लिये यहाँ पर आई हूँ।”

बादशाह ने फिर पूछा-“तब मैं कैसे आया ।” बेगम ने उत्तर दिया-“स्वामी! आपने मुझे आज्ञा दी थी कि जो तुम्हारी सब से प्यारी वस्तु हो उसे अपने साथ लेती जाओ।”

मैं ईश्वर की साक्षी देकर कहती हूँ कि महल भर में ही नहीं बल्कि समस्त ससार में आपसे बढ़कर मुझे कुछ भी प्यारा नहीं है। इसलिये मैं आपको अपने साथ लेकर यहाँ चली आई हु।”

बेगम के ऐसे अनुराग को देखकर बादशाह. दयाद्र हो गये और उस के अपराधों की माफी दी। फिर अपने ससुर से मिल भेट सबकी राजी कर सास ससुर की अनुमति से उसी दिन बेगम के सहित अपने नगर को लौट आये। .

बादशाह फिर से उस बेगम से अच्छा बर्ताव करने लगे

___कुछ दिनों के बाद जब फिर बेगम और बादशाह में भली भाँति प्रेम हो गया तो एक दिन ससुराल जाने वाली बात बादशाह के ध्यान में आ गई

तुरत बेगम से पूछा-“प्रिये ! क्या तू बतला सकती हो कि उस रोज तुम किसकी सम्मति से मुझे अपने पीहर ले गई थी।”

बेगम ने उत्तर दिया-“स्वामी! वह आपके चतुर दीवान बीरबल की सम्मत्ति थी। उन्हीं की कृपा से मुझे आप फिर से प्राप्त हुए हैं।” बादशाह बीरबल पर प्रसन्न होकर उसे बहुत धन्यवाद दिये।

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(4) कुएँ का पानी बना समस्या (अकबर बीरबल की कहानी) – Akbar Birbal ki kahani


 

मुगल बादशाह अकबर के समय की बात करें तो अकबर के शासनकाल में प्रजा सुखी थी। छोटे से गांव के लोग भी खुश थे। अगर किसी को कोई आपत्ति होती तो शाही दरबार उसका समाधान करता।

अकबर किसी समस्या का समाधान न कर पाए तब बीरबल को बता देना। और बीरबल ने बड़ी चतुराई से मामले को सुलझाया करता।

धरमपुर नाम का एक गाँव था। गाँव में दो भाई थे, रतनजी और हरसंगजी, रतनजी एक अच्छे इंसान थे। उनके छोटे भाई हरसंगजी चतुर और महाचतुर थे,

दोनों भाइयों ने पिता के खेत को दो हिस्सों में बांट दिया। हरसंगजी चतुर थे। कुएं वाला हिस्सा खुद रखा था, रतनजी के खेत में कोई कुआं नहीं था। इसलिए फसल कम होती थी, इससे इनकी कमाई उतनी ही कम होती।

हरसंगजी की फसल अच्छी थी। बहुत कमाया। उसने अपने खेत में एक और कुआँ खोदा,

रतनजी ने कहा ‘भाई! तुम्हारे पास दो कुआ है, मुझे एक दो।’ हरसंगजी कहते हैं, ‘कुवो को मुफ्त में कौन देता है?’ रतनजी कहते हैं, “भैया, मैं आपको इनकी कीमत देता हूं,” हरसंगजी ने कहा, “कितना देंगे?” रतनजी कहते हैं, “आपको कितनी चाहिए?”

दोनों ने कीमत तय की। रतनजी ने पैसे दिए, हरसंगजी को ।

अगले दिन रतनजी खेत में गए। कुएं का पानी उसके खेत में निकालने लगा। हरसंगजी वहाँ आए। वह कहते हैं, रतनजी तुम पानी नहीं ले सकते, रतनजी कहते हैं, भाई! मैंने या तुम्हारा कुआँ खरीदा है, हरसंगजी कहते हैं, हाँ! सिर्फ कुएं खरीदे, पानी नहीं खरीदा। रतनजी कहते हैं, ‘कुए के साथ, पानी भी आएगा! हरसंगजी कहते हैं, “नहीं भाई! मैंने तुम्हे पानी नहीं बेचा, उसे लेने के लिए मुझे अलग से पैसे देने होगे। ‘

रतनजी कहते हैं, “कितना?”

हरसंगजी कहते हैं, ‘जब तुम जितना पानी लो उतना! ‘

रतनजी कहते हैं, ‘ऐसा नहीं होता भाई’। तो मैंने यह कुआँ खरीदा, उसका  क्या काम?’

हरसंगजी कहते हैं, ‘आपही जाने , भाई! ‘

रतनजी ने पंचायत से शिकायत की तो पंचायत ने कहा, जब कोई कुआ बेचे तब पानी को भी साथ में ही समझना लेकिन बेचने के करार में पानी के साथ कुआ ऐसा लिखा होना चाहिए, अगर नहीं लिखा है तो पानी नहीं मिलेगा, और रतनजी के दस्तावेज में पानी के साथ कुआ ऐसा नहीं लिखा था सिर्फ कुआ के बेचने के कागज़ बनाये थे

हरसंगजी ठग रहा हैं, यह सब जानते थे, लेकिन दस्तावेज के अनुसार कुछ नहीं कहा जा सकता।

रतनजी निराश हो गए। रतनजी की पत्नी रमादेवी ने कहा, “क्या बात है?” रतनजी रो पड़े, सारी बात अपनी पत्नी को बता दी। रमादेवी कहती हैं, ‘महल में जाओ’

बात महल तक पहुँची, अकबर ने पूरी बात सुनी। सोचा कि यह कानूनी था, हरसंगजी सही थे, लेकिन इसमे अन्याय था, क्या करें? अंत में अकबर ने बीरबल से कहा, “आप इसे फैसला करें।”

बीरबल उठे और हरसंगजी के पास आए और कहा, ‘हरसंगजी, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं, आप बस’

कुआ बेचा, पानी नहीं बेचा, यह तुम्हारा है, रतनजी मुफ्त में पानी नहीं ले सकते, ‘

सारा दरबार चौंक गया, बीरबल ऐसा क्यों कहते हैं! निराश हो गए रतनजी, अब पैसा बिगड़ा हैं !

बीरबल ने कहा, “रतनजी, आपने दस्तावेज में पानी नहीं लिखा तो पानी आपका नहीं है।”

तब बीरबल हरसंगजी की ओर मुड़ते हैं और कहते हैं, ‘हरसंगजी, तुम बताओ, तुमने कुआं बेच दिया है। ठीक है? ‘

हरसंगजी उत्साह से बोले, ‘हाँ सर! ‘| बीरबल कहते हैं, “क्या अब कुआँ रतनजी का है?” हरसंगजी कहते हैं, “मुझे परवाह नहीं है।”

बीरबल कहते हैं, “तो फिर तुमने अपना पानी रतनजी के कुएँ में क्यों डाला?” सुनते ही हरसंगजी चकित हो गए,

बीरबल कहते हैं, ‘कुआं रतनजी के पास है। आप इसके कुएं में बिना पूछे अपना पानी नहीं रख सकते।’

हरसंगजी कहते हैं, ‘लेकिन साहब! ‘

बीरबल ने सख्ती से कहा, “लेकिन कुछ नहीं। कल सुबह तक आपको अपना सारा पानी निकाल लेना है, जो सुभह तक खाली होना चाहिए। हरासंगजी कहता है, ‘यह कैसे हो सकता है?

बीरबल कहते हैं, “यदि आप अपना पानी कुएं में रखते हैं, तो आपको रतनजी को एक दिन में पांच सोने की मुहरें देनी होंगी।” ‘

अब हरसंगजी निराश हो गए। उसने महसूस किया कि बीरबल ने उसे फँसा लिया था,

‘सर, अगर मैं आपको एक दिन में पाँच सोने के सिक्के दूँ, तो मैं बर्बाद हो जाऊँगा।

बीरबल कहते हैं, ”कुआं बेचने से पहले आपको इसके बारे में सोचना था।” अब कुछ नहीं हो सकता है। हरसंगजी कहते हैं, “सर, कोई रास्ता खोजो।”

बीरबल कहते हैं, “लिखो कि तुमने कुएँ और कुएँ के पानी दोनों को बेच दिया है।”

हरसंगजी हार गए और लिख के दिया। रतनजी बीरबल के चरणों में गिर पड़े, यह था बीरबल का चातुर्य,


(5) मित्रों मित्रों में ईर्ष्या – akbar aur birbal ki kahani


अकबर बीरबल की कहानी

लोग कहां करते हैं कि संतान पर माता पिता के खून का बड़ा असर पड़ता है। वह प्रत्यक्ष देखने में भी आया है। बादशाह और दीवान के मैत्री का प्रभाव उनके लड़कों पर भी पड़ा। वे भी आपस में बड़े मित्र हो गए। यहां तक नौबत पहुंची कि वे दोनों अपना सारा कारोबार छोड़कर मैत्री भाव का पालन करने लगे। यह बात बढ़ते हुए बादशाह के कान तक पहुंची।

जिस कारण वह बहुत क्रोधित हुआ और उनकी मैत्री भंग करने का उपाय सोचने लगा। उसने इस काम का भार बीरबल को सुप्रत कर दिया।

एक दिन बीरबल ने भरी सभा में दीवान के लड़के को बुलाकर उसने कान में कान से मुंह सटाकर अलग कर दिया। परंतु कहा कुछ भी नहीं। फिर लोगों को सुनाई दे इस तरह बोला- सावधान इस बात को किसी दूसरे के सामने कदा पि न कहना। दीवान का लड़का वहां से चिडा होकर चुपचाप अपने घर चला गया।

जब दोनों मित्र फिर अपने समय पर एकत्रित हुए। तो शहजादे ने पूछा कहो मित्र! आपके कान से मुह लगाकर कल सभा में बीरबल ने क्या कहा था। तब दीवान के लड़के ने उत्तर दिया “मित्रवर उसने मुझसे कहा तो कुछ भी नहीं परंतु झूठ मुठ मेरे कान से मुंह लगाकर हटा दिया। शहजादे ने कहा, “मित्रवर आज यही नई प्रणाली कैसी! आप तो कभी किसी बात की मुझसे छुपा नहीं करते थे।

बीरबल की चतुराई

शहजादे के मन में इतने ही से खटका, उत्पन्न हो गया जिससे वह थोड़े समय में ही दीवान के लड़के से अलग हो गया। और फिर कभी उससे मित्रता न की। इधर से दिल का झुकाव हट जाने से उसका मन निजी कारोबार में लग गया। बादशाह ने बीरबल की इस बुद्धिमता से बड़ा प्रसन्न हुआ। और उसे खुश करने के लिए बहुत सा पुरस्कार दिया।


(6) इश्वर का रूप – akbar birbal ki story in hindi


बादशाह ने एक बार बीरबल से पूछा कि यदि केवल एक ही ईश्वर है| और कोई नहीं है, तो इन सभी देवी-देवताओं का क्या अर्थ है?

बीरबल ने दीवान को एक विशेष पहरे पर खड़े संतरी के पास बुलाया और अपनी पगड़ी की ओर इशारा किया और सम्राट से पूछा कि यह क्या है। अकबर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, पगड़ी!

बीरबल ने संतरी को पगड़ी खोलने के लिए कहा … उसने झिझकते हुए अपनी पगड़ी खोली। बीरबल ने उसे अपनी कमर के चारों ओर बाँधने के लिए कहा, संतरी ने किया। तब बीरबल ने फिर सम्राट से पूछा कि यह क्या है। अकबर ने कहा, करधनी!

तब बीरबल ने उसे अपने कंधे पर पगड़ी रखने को कहा और अकबर से पूछा- कि यह क्या है? अकबर ने कहा, दुपट्टा।

बीरबल ने हाथ में कपड़ा लिया और पूछा- लेकिन, वास्तव में यह क्या है? अकबर ने भी पूछा- क्या है? बीरबल ने कहा, कपड़े पहने।

तब बीरबल ने कहा- इस तरह से भगवान भी एक हैं, लेकिन अपने भक्तों को उनकी भावना के अनुसार अलग-अलग तरह से दिखाई देते हैं।

इस उदाहरण के कारण, अकबर की आँखों में बीरबल का सम्मान बढ़ गया।


(7) फलोका राजा आम  – akbar birbal ki story


बादशाह अकबर ने एक दिन सभी दरबारियों के लिए भोजन रखा, उन्हें बीरबल से विशेष प्रेम था इसलिए वह इस पर जोर दे रहे थे। बीरबल खाने से नाराज हो गए इसलिए उन्होंने सम्राट से माफी मांगी और कहा कि “मैं अब और नहीं खा सकता क्योंकि मेरे पेट में जगह नहीं है। मैं आपकी बात नहीं मान सकता।” तभी एक नौकर ने आम को काट लिया और लाया, बीरबल का दिमाग आम को देखकर ललचा गया।

बीरबल ने अपना हाथ बढ़ाया और आम के कुछ टुकड़ों को अपने पेट में ले लिया। उसे इस तरह आम खाते हुए देखकर अकबर को गुस्सा आ गया कि जब मैं खाना खिला रहा था, तो उसके पेट में जगह नहीं थी और अब वह कैसे खा रहा है। वह तुरंत गुस्से में चिल्लाया और बीरबल को बुलाया।

बीरबल ने उसके गुस्से का कारण समझा। वह अकबर के सामने खड़ा हो गया और अपने हाथों को पकड़ कर कहा, “जब सड़क पर बहुत भीड़ हो, और चलने के लिए एक पैर रखने के लिए भी पर्याप्त जगह न हो, तो भी अगर आपकी सवारी निकल जाए, तो हर किसी को अपनी जगह बनाकर आपके लिए रास्ता बनाना होगा।” उसी तरह, “आम” सभी फलों पर राज करता है, यह आपकी तरह ही फलों का राजा है, इसलिए इसे देखने से पेट में जगह बनती है।

अकबर बीरबल का जवाब सुनकर खुश हो गया, उसने मीठे आमों की एक टोकरी मंगवाई और एक कीमती उपहार के साथ बीरबल को दे दी। इस मधुर उपहार को पाकर बीरबल बहुत खुश हुए।


(8)अधिकतर प्रिय क्या है? – akbar birbal ki kahaniyan


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एक दिन बादशाह अपने दरबार में बैठा था। और दो वर्षीय शहजादा सलीम उसकी गोद में आनंद से खेल रहा था। उसकी बाल चपलता देखकर बादशाह आनंद मगन हो गया। और आनंद कानन में उसके मन में यह प्रश्न उपस्थित हुआ। जीवधारी को अधिकतर प्रिय क्या है? बादशाह को चुप देखकर सलीम उसका ध्यान अपनी तरफ आकर्शित करने के लिए प्रेरित करने के अभिप्राय से तुलना कर कुछ बोला उसकी बातों ने बादशाह के आनंद को और भी बढ़ा दिया। आनंद बस वह अपने मनोगत भावों को दबा ना सका और तत्क्षण समस्त दरबारियों की तरफ लक्ष्य करके

पूछा इस पृथ्वी पर के प्राणियों को अधिकतर प्रिय क्या है?

दरबारी सोच में पड़ गए। कोई कुछ कहता तो कोई कुछ, अंत में आपस में गोष्ठी करने लगे परंतु फिर भी किसी सिद्धांत पर अटल नहीं हुए। बीरबल की अनुपस्थिति मैं इन विचारों पर कभी बे जैसी भी तर्क आया करता था। यदि बीरबल प्रस्तुत होता तब तो उनका वह कारण था। बच्चा भी बीरबल के रहते ऐसी बातें किसी दूसरे दरबारी से कभी ना पूछता! आज की सभा में बीरबल न था जिस कारण इसके ऊपर ऐसी आफत आई कुछ देर सोच समझ लेने के बाद सर्वसम्मति मिलाकर एक वृध्ध दरबारी बोला पृथ्वीनाथ ‘अधिकतर प्रिय लड़का होता है।”

दरबारियों ने आपस की गोष्टी से निश्चित कर लिया कि इस समय बादशाह लड़के को गोद में लिए हुए खेला रहा है। अतः एवं उसके प्रश्न का इशारा लड़के की तरफ ही है। बादशाह उस समय वृध्ध दरबार का उत्तर स्वीकार कर लिया और सभा बर्खास्त हुई।

बीरबल राजकीय कार्य से कहीं बाहर गया था। और दूसरे ही दिन आ पहुंचा। बीरबल को सभा में बैठते ही वही प्रश्न उससे भी किया। वह बोला गरीब परवर प्राणी को अपना जीव सबसे अधिक प्यारा होता है। इसकी तुलना और किसी से नहीं की जा सकती। चाहे वह अपना कितना ही सगा संबंधी क्यों ना हो। तब बादशाह अपने दरबारियों का सम्मान रखने के लिए बीरबल की बात काट कर कहा। “तुम्हारा कहना गलत है क्या लड़का प्राण से प्यारा नहीं होता?।

बीरबल को प्रमाण देने को कहा

तुमको यदि अपने कहने पर अटल विश्वास है। तो उसे प्रमाणित कर दिखाओ” बीरबल बादशाह की आज्ञा शिरोधार्य करता हुआ बोला,” पृथ्वीनाथ बाग का एक बड़ा पानी का ओझ खाली करने की बागवान को अनुमति दी जाए। तब तक मैं बाजार से परीक्षा की चीजें लेकर लौट आता हूं। आप सभासदों सहित बाग में उपस्थित रहे। वहीं पर मैं इस बात को प्रमाणित करके दिखलाऊंगा।

बादशाह की याग्या पाकर बागवान ने प्राण प्राण से परिश्रम करके थोड़ी ही देर में सबसे बड़े होज को खाली कर सूचना दी। बाग में बैठने के लिए बादशाह की तरफ से समुचित प्रबंध किया गया। और वे दरबारियों सहित बाग में दाखिल हुए।

तब तक बीरबल भी एक बंदरिया को उसके बच्चे सहित लेकर बाग में आया। बीरबल ने दरबारियों बंदरिया को बच्चे सहित हौज के मध्य भाग में बिठाकर ऊपर से पानी भरने की आग्या दी। ओझ में पानी भरा जाने लगा पानी क्रमश ओझ के ऊपर चढ़ ता गया तब तब बंदरिया आपने बच्चे को उचा उठती गई। जब पानी बढ़ कर उसके मुह तक पहुंचा तो वह खड़ी हो गई। और अपने बच्चे को अपने हाथ पर रखकर ऊपर उठा लिया। सब लोग इस नजारे को बड़ी गौर से देख रहे थे। बादशाह बीरबल को चिंता कर बोला

शहंशाह:बीरबल क्या देखते नहीं हो।

कि ये बंदरिया अपने प्राणों पर खेलकर बच्चे को बचा रही है। क्या अभी पुत्र को सर्वोपरि मानने को तैयार नहीं हो। बीरबल ने उत्तर दिया पृथ्वीनाथ थोड़ा और ठहर जा अभी बंदरिया के प्राण प्राण पर नहीं आई है। थोड़ी देर में अपने आप ही फैसला हो जाएगा।

बंदरिया पानी में डूबने लगी

अभी बीरबल और बादशाह में उपरोक्त बातें हो रही थी। कि बंदरिया के मुख में पानी भरना शुरू हुआ। पानी भरने के कारण उसका दम घुटने की नौबत आ गई। नाक में पानी भरने लगा, वह अधीर होकर बहने लगी। आखिरकार लाचार हो उसने बच्चे की ममता छोड़ दी। और अपना प्राण बचाने के लिए एक नया उपाय निकाला।

बच्चे को पानी में डूबा कर अब स्वयं उसके ऊपर खड़ी हो गई। इस प्रकार उसका मुंह पानी से ऊपर हो गया। बीरबल ने बादशाह को उसे दिखलाकर बागवान को पानी रोकने की आदेश दीया पानी आना तुरंत बंद हो गया। और बंदरिया बच्चे सहित सजीव बाहर निकाल ली गई।

बीरबल ने कहा:शहंशाह आपने देखा है। कि जब तक प्राण बचने की आशा थी तब तक बंदरिया बच्चे का प्राण बचाने की पूरी कौशिस करती रही। परंतु जब उसके ही प्राणों पर आफत आई। तब वह बच्चे की जीवन रक्षा भूल गई। बल्कि स्वयं उसके जान की ग्राहक होकर अपना प्राण बचाया। बादशाह दरबारियों सहित बीरबल के बुद्धि की श्रेष्ठता स्वीकार कर ली। और बहोत प्रसन्न हुए।

आपको ये अकबर बीरबल की कहानी हिंदी में (akbar birbal ki kahani) कैसी लगी हमें comment में जरुर बताइयेगा.

 

 

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