महात्मा गाँधी की कहानी (mahatma gandhi ki kahani )

महात्मा गाँधी जो अपना देश को आज़ाद करने में अमूल्य योगदान दिया है. उसी महात्मा के बारे में यहाँ mahatma gandhi ki kahani है. जो आपको बहोत ही सरल और अच्छी जानकारी मिलेगी.

mahatma gandhi ki kahani
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पहला सबक-mahatma gandhi ki kahani

मोहनदास गाँधी का जन्म 1869 में भारत में बंबई, के उत्तर में एक छोटे से शहर में हुआ था. उन्हें लोग मोहन के नाम से बुलाते थे. वह छह बच्चों में सबसे छोटे थे. संयुक्त परिवार में उनके चाचा, चाची और चचेरे भाई भी उनके साथ ही रहते थे. मोहन के पिता शहर के दीवान थे. दीवान वो अधिकारी होता है जो लोगों के बीच की समस्याओं को सुलझाता है – बिलकुल एक जज जैसे.

मोहन ने अपनी मां से हिंदू धर्म के बारे में जाना. माँ, उसे एक हिंदू मंदिर में ले जाती थीं. वहां मोहन ने माँ को गरीबों और बीमारों की देखभाल करते हुए देखा. मां धार्मिक पर्वो पर उपवास करती थीं. उपवास वाले दिन वो कुछ भी नहीं खाती थीं. इस पद्धति का उपयोग बाद में गांधी ने अपने जीवन में राजनैतिक कार्य के दौरान किया.

मोहन स्कूल में शर्मीला था, लेकिन वो घर में बहुत शैतानी करता था. वो अपनी बहनों को छेड़ता था और तमाम परेशानियां पैदा करता था.

इंग्लेंड के लिए रवाना-mahatma gandhi ki kahani

हिंदू लोग, जाति व्यवस्था में विश्वास करते थे. उनका मानना था कि कुछ लोग दूसरों से बेहतर होते हैं. हिन्दू समाज ने लोगों को चार समूहों में विभाजित किया; ब्राह्मण, क्षत्रिय, बनिया और शूद्र. उसमें शूद्र या अछूत सबसे गरीब लोग थे. उनसे कोई बात तक नहीं करता था. मोहन का परिवार व्यापारियों की जाति से संबंधित था. जब वे 18 वर्ष के थे, तब मोहन के परिवार ने उन्हें इंग्लैंड के एक कॉलेज में भेजने का फैसला किया. उस समय, इंग्लैंड का भारत पर शासन था. जब व्यापारी जाति के नेताओं को इसका पता चला, तो वो क्रोधित हुए क्योंकि उनकी जाति का कोई भी व्यक्ति कभी भी पढ़ाई के लिए देश से बाहर नहीं गया था!

लेकिन मोहन अपनी बात पर अड़ गया और उसने कहा कि वो किसी भी हालत में विदेश जाएगा. नेताओं ने मोहन को व्यापारी जाति से निष्कासित कर दिया. उन्होंने कहा कि उसके बाद कोई भी मोहन से बात नहीं करेगा. पर मोहन ने उस नेता के खिलाफ कोई द्वेष नहीं रखा. फिर उसके बाद वो कभी भी जाति का हिस्सा नहीं बना.

मोहन इंग्लैंड में तीन वर्षों तक रहा और वकील बना. उसने अपनी माँ से वादा किया था कि वो मांस नहीं खाएगा, और न ही शराब पियेगा. उसने अपने दोनों वादे निभाए.

महात्मा गाँधी पूरा जीवन शाकाहारी बने रहे –mahatma gandhi ki kahani

इंग्लैंड में उसे शाकाहारी बने रहने में काफी परेशानी हुई, क्योंकि वहां सभी लोग मांस खाते थे. पहले कुछ महीनों वो रोटी, दलिया और कोको पर जीवित रहा. अंत में, उसे एक शाकाहारी रेस्तरां मिला जहाँ उसे मनपसंद भोजन खाने को मिला. मोहन जीवन भर शाकाहारी बना रहा. उसने केवल फल, सब्जियाँ और रोटी ही खाई.

इंग्लैंड में गांधी की पैदल चलने की आदत पड़ी. वो लंदन में हर जगह पैदल चलकर जाता था. इस आदत से उसने पैसे भी बचाए और वो अच्छी सेहत में भी रहा. वर्षों बाद, वो खुद से बहुत कम उम्र के लोगों से भी अधिक तेज़ और दर चल सकता था।

मोहन का पढ़ाई में प्रदर्शन अच्छा रहा. उसने दुनिया के बारे में भी बहुत कुछ सीखा. उसने अंग्रेजी भाषा का अच्छी तरह से उपयोग करना सीखा. इंग्लैंड में वो कई अलग-अलग लोगों से मिला. मोहन ने कई अखबार पढ़े, जो उसने घर पर कभी नहीं पढ़े थे.

गांधी ने अन्य धर्मों का भी अध्ययन किया. वह पहाड़ पर दिए यीशु के उपदेश से बहुत प्रभावित हुए.

“अगर कोई भी आपके दाहिने गाल पर चांटा मारे तो उसकी ओर अपना दूसरा गाल भी घुमायें. और यदि कोई आदमी आपकी कमीज़ छीन ले, तो उसे आप अपना कोट भी पहना दें.”

मोहन गांधी लगातार क्षमा का पाठ सीखते रहा.

mahatma gandhi ki jivani hindi mai
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एक कविता जो मोहन गांधी ने एक बच्चे के रूप में सीखी थी:

जो लोग वास्तव में नेक होते हैं वे सभी लोगों के साथ एक-जैसा व्यवहार करते हैं. वे बुराई करने वालों में खुशियां बांटते हैं. इसका मतलब यह है कि अगर कोई आपके साथ कुछ बुरा करे तो आप उसके साथ कुछ अच्छा करें.

दक्षिण अफ्रीका में एक वकील-mahatma gandhi ki kahani

1891 में, गांधी इंग्लैंड से लौटे. उन्हें घर आने की खुशी हई लेकिन एक बुरी खबर उनका इंतजार कर रही थी. इंग्लैंड छोड़ने से कुछ महीने पहले ही उनकी मां की मृत्यु हो गई थी. इससे गांधी बहुत उदास हए. उनकी माँ को अब यह कभी नहीं पता चलेगा कि उसने अपने वादे निभाए थे और अपनी कानून की डिग्री पूरी की थी.

जब गांधी ने भारत में एक वकील के रूप में काम किया तो उसमें वे बहुत सफल नहीं हुए. वह अंग्रेजी कानून जानते थे, लेकिन भारतीय कानून नहीं.

1893 में एक केस को संभालने

के लिए उन्हें दक्षिण अफ्रीका भेजा गया. दक्षिण अफ्रीका में एक भारतीय के लिए रहना आसान नहीं था. दक्षिण अफ्रीका के कुछ हिस्सों में, भारतीयों के पास न तो जमीन थी और न ही कोई व्यवसाय, उनके लिए रात में नौ बजे के बाद टहलना भी वर्जित था।

एक दिन गांधी फर्स्ट क्लास के टिकट के साथ ट्रेन में सवार हए, क्योंकि वो गोरे नहीं थे इसलिए उनसे फर्स्ट क्लास का डिब्बा छोड़ने को कहा गया. जब उन्होंने ऐसा करने से इनकार किया तो एक पुलिसकर्मी ने गाँधी को ट्रेन से फेंक दिया. उन्हें रेलवे स्टेशन में रात भर बैठे रहना पड़ा. अब उनके पास सोचने के लिए बहुत समय था. महात्मा गाँधी ने भारतीयों के प्रति इस भेदभाव का प्रतिरोध करने का फैसला किया.

गांधी लगभग बीस वर्षों तक दक्षिण अफ्रीका में रहे. वो अपनी पत्नी को वहां अपने साथ रहने के लिए ले गए. गांधी वहां रहने वाले भारतीयों के बीच एक नेता बन गए. उन्होंने भारतीय लोगों के जीवन को आसान बनाने के लिए कड़ी मेहनत की, और एक समाचार पत्र शुरू किया. उन्होंने एक बड़ा फार्म खरीदा जहां भारतीयों ने एक-दूसरे की मदद करने के लिए मिलकर काम किया. उन्होंने अपने कपड़े खुद बनाए और जमीन पर खेती की. उन्होंने संतरे उगाए और रोटी के लिए खुद गेहूं उगाया.

आफ्रीकी सरकार

दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने भारतीयों को एक विशेष कर चुकाने का आदेश दिया. जब गांधी ने लोगों से उस टैक्स का भुगतान न करने को कहा तो भारतीयों ने उनकी बात सुनी. जब गांधी ने टैक्स का भुगतान करने से इनकार किया, तो जनरल स्मट्स नाम के पुलिस अफसर ने उन्हें जेल में डाल दिया. गांधी को जेल जाने से कोई ऐतराज़ नहीं था. उन्होंने जेल में अपना समय सोचने और किताबें पढ़ने के लिए उपयोग किया. गाँधी ने एक जोड़ी सैंडल भी बनाई, जिन्हें उन्होंने फार्म पर बनाना सीखा था. अंत में,

सार्वजनिक नाराजगी के दबाव ने गांधी को छोड़ दिया गया. गांधी ने दक्षिण अफ्रीका तब तक नहीं छोड़ा जब तक कि सरकार ने भारतीयों को स्वतंत्रता देने वाला कानून पास नहीं किया. क्षमा के संकेत के रूप में, गांधी ने जनरल स्मट्स को जेल में बनाए गए सैंडल की एक जोड़ी भेंट की.

गांधी ने बुराई से लड़ने का एक नया तरीका ढूंढा. उसका नाम था सत्याग्रह जिसका अर्थ है “सत्य का बल”. कई लोग इसे “शांतिपूर्ण प्रतिरोध” भी कहते हैं. गांधी बंदूक या हाथापाई में विश्वास नहीं करते थे. उनका मानना था कि किसी से लड़ने का सबसे अच्छा तरीका है – तुम वो मत करो जो वो तुम से करवाना चाहता है

वापस भारत में-mahatma gandhi ki kahani

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जब 1911 में जब गांधी भारत लौटे, तब देश में अंग्रेजों का शासन था. अंग्रेजों की दिलचस्पी भारत की सम्पदा- उसके मसाले, कपड़े और अन्य सामान के भंडार पर थी. उन्होंने भारत से इन उत्पादों को लिया और फिर लोगों को उसी सामान को वापिस ऊंची कीमतों पर खरीदने को मजबूर किया.

गांधी चाहते थे कि अंग्रेज भारत को, भारतीय लोगों को वापस कर दें. वो चाहते थे कि भारतीय अपने देश पर खुद शासन करें. अपने शेष जीवन में उन्होंने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए काम किया. लेकिन, इन सबसे ऊपर, गांधी चाहते थे कि इस नए भारत में सभी लोग समान हों. कोई भी व्यक्ति अछूत न हो.

गांधी ने एक वकील के रूप में काफी पैसे कमाए, लेकिन उन्होंने एक सरल जीवन जीने का फैसला किया. यह काम उनकी पत्नी और परिवार के लिए कठिन था. उन्होंने गरीबों की मदद करने में अपना सारा पैसा लगाया. गाँधी हर जगह पैदल चल कर जाते. उनके पास जो एकमात्र कपड़े थे, वो थी सैंडल और एक धोती. उन्होंने पूरे देश की यात्रा की और लोगों की असली ज़रूरतों का पता लगाया. गांधी छोटे कद के एक पतले-दुबले आदमी थे जो चश्मा पहनते थे. भारत में हर कोई उनसे प्यार करने लगा. लोगों उन्हें “महात्मा” के नाम से बुलाने लगे जिसका अर्थ था “महान आत्मा.” क्योंकि गाँधी बहुत नेक थे इसलिए बहुत से लोग उन्हें संत मानते थे.

क्योंकि गाँधी बहुत नेक थे

गांधी को लोगों द्वारा उन्हें संत समझना ठीक नहीं लगता था. एक बार गांधी के साथ ट्रेन में सवार एक व्यक्ति प्लेटफॉर्म से गिर गया, लेकिन उसे कोई खास चोट नहीं आई. उस आदमी ने दावा किया कि उसे इसलिए कोई चोट नहीं आई क्योंकि वो एक संत के बगल में बैठा था. गांधी ने कहा, “अगर यह सच था, तो फिर तुम गिरे ही क्यो!”


गांधी ने महसूस किया कि भारत को आज़ाद होने के लिए, भारतीय लोगों को कोई ब्रिटिश सामान नहीं खरीदना चाहिए. उन्होंने लोगों से इंग्लैंड में बने कपड़े खरीदने को मना किया. जहाँ भी गाँधी गए उन्होंने लोगों को चरखा दिया ताकि वे अपने कपड़े खुद बना सकें. गाँधी चाहते थे कि उनके लोग आत्मनिर्भर बनें ताकि उन्हें अंग्रेजों की जरूरत ही न पड़े.

सभी को नमक चाहिए. नमक पूरे भारत के समुद्री तटों पर बनता है. नमक समुद्र से आता है. अंग्रेजों ने भारतीयों को इस नमक को इकट्ठा करने की अनुमति नहीं दी. अंग्रेजों की एक ऐसी कंपनी थीं जो नमक इकट्ठा करके उसे वापस भारतीयों को बेचती थीं. गांधी को यह व्यवस्था पसंद नहीं थी. उन्होंने एक आंदोलन शुरू किया जो “नमक यात्रा” के नाम से जाना गया. हजारों लोग गांधी के साथ समुद्र तट पर गए. वहाँ उन्होंने एक मुट्ठी नमक उठाया. उनके सभी अनुयायियों ने भी ऐसा ही किया. ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया. जब गांधी को गिरफ्तार किया गया, तब भी लोगों ने गाँधी की बात ही मानी. लोग अंग्रेजों का विरोध करते रहे, लेकिन वे कभी हिंसा पर उतारू नहीं हुए.

“मैंने आज जो भी किया वो एक बहुत साधारण सी बात थी. मैंने घोषणा की कि अंग्रेज मुझे अपने देश में इधर-उधर जाने का आदेश नहीं दे सकते.” – गांधी

वर्ष का श्रेष्ठ मानव-mahatma gandhi ki kahani

1931 में गांधी को “टाइम” पत्रिका ने मैन ऑफ द ईयर चुना. वे पूरी दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण लोगों में से एक थे. लेकिन उन्होंने अपनी सरल जिंदगी जीना जारी रखी. वह अभी भी भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे, लेकिन अंग्रेज, भारत को जाने नहीं देना चाहते थे.

एक बार गांधी ब्रिटिश प्रधानमंत्री से मिलने इंग्लैंड गए, वो केवल एक धोती, सैंडल और शॉल पहने थे. किसी ने उनसे पूछा कि वे इतने कम कपड़े क्यों पहने थे. गांधी ने व्यंग में कहा, “नहीं, ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने हम दोनों के लिए पर्याप्त कपड़े पहने हैं.” जब द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हआ, तो अंग्रेजों को उम्मीद थी कि भारत उनके पक्ष में काम करेगा. लेकिन भारतीय, अंग्रेजों की मदद करते-करते थक चुके थे. गांधी, अंग्रेजों को भारत से बाहर करना चाहते थे. पर उन्हें डर था कि कहीं जापानी, अंग्रेजों से बदला लेने के लिए भारत पर हमला न कर दें.

गांधी को दंगे भड़काने के लिए फिर से जेल भेज दिया गया. जब वो जेल में थे तब उन्होंने कुछ भी खाना खाने से इनकार कर दिया. माँ की सीख के अनुसार उन्होंने उपवास किया. बहुत दिनों तक उपवास करने के बाद गाँधी बहुत कमजोर हो गए. अंग्रेजों को गाँधी के मरने का डर था. इसलिए उन्होंने गाँधी को रिहा कर दिया.

1947 में द्वितीय महायुद्ध

1947 में द्वितीय महायुद्ध के बाद, अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्रता दी. पूरे भारत ने इसका जश्न मनाया. भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष ने गांधी को राष्ट्रपिता बुलाया. गांधी, अपने अनुयायियों, अपने गोल चश्मे और अपने चरखे के साथ, भारत की स्वतंत्र का प्रतीक बन गए.

लेकिन गांधी अपने घर पर ही रहे. उन्होंने किताबें पढ़ीं और प्रार्थना की. वह राजनीति से दूर रहे. उसने हमेशा कहा था कि वह 125 वर्ष तक जिंदा रहना चाहता थे, लेकिन अब वो इस बात को लेकर इतने पक्के नहीं थे. वो अब 78 साल के थे, और जीवन भर कड़ी मेहनत से थक गए थे.

गांधी ने कभी यह उम्मीद नहीं छोड़ी कि भारत ज़रूर अपनी स्वतंत्रता जीतेगा:

 “मैं हमेशा आशावादी हूं. मैं मानता हूं कि मुझे अभी भी समुद्र से जमीन नहीं दिख रही है. लेकिन यह बात तो आखिरी क्षण तक, कोलंबस के साथ भी हुई थी.”

अंतिम लड़ाई-mahatma gandhi ki kahani

जब भारत स्वतंत्र हुआ तब दो धार्मिक समूहों के बीच लड़ाई छिड़ गई. मुसलमान और हिंदू आपस में लड़ने लगे. मुसलमान अपना एक अलग देश चाहते थे. गांधी चाहते थे कि सभी लोग शांति से रहें. लेकिन उन शहरों में जहां दोनों धार्मिक समूह रहते थे वहां भयानक लड़ाइयाँ शुरू हुईं.

फिर गांधी ने अपना दूसरा उपवास शुरू किया. उन्होंने अपने लोगों से कहा कि वे तब तक खाना नहीं खाएंगे जब तक कि लड़ाई और दंगे बंद नहीं होते. तीन दिन बाद, हिंदू, मुस्लिम और ईसाई नेताओं ने एक-दूसरे के साथ मिलने का वादा किया. उसके बाद ही गांधी ने संतरे का रस पिया और अपना अनशन खत्म किया.

लेकिन गांधी के प्रयासों के बावजूद, देश का विभाजन हुआ. हिंदू लोग भारत में ही रहे. मुस्लिमानों ने पाकिस्तान नामक एक नए देश का गठन किया. यह सभी भारतीयों के लिए एक भयानक समय था. लाखों लोगों को अपने घरों और धंधों को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. गांधी, भारत के इस टूटने से कभी भी उबर नहीं पाए. उन्हें लगा कि उन्होंने पर्याप्त मेहनत नहीं की थी.

“भारत की स्वतंत्रता का अर्थ हमारे लिए सब कुछ है. लेकिन यह दुनिया के लिए भी बहुत मायने रखता है. स्वतंत्रता को अहिंसा के माध्यम से जीतना पूरी दुनिया में एक नए सन्देश का आगाज़ करेगा.” – गाँधी

अंतिम क्षमा-mahatma gandhi ki kahani

एक दिन गांधी ने अपने एक अनुयायी से कहा, “अगर कोई मुझे मारने की कोशिश करेगा तो मैं अपनी आखिरी सांस में भगवान का नाम लूँगा. उससे मैं अपने कातिल को माफ कर दूंगा.” तीन दिन बाद, 30 जनवरी, 1948 को. गांधी एक प्रार्थना सभा का नेतृत्व करने गए. उन्हें सुनने के लिए बड़ी संख्या में उनके अनुयायी और दोस्त वहां मौजूद थे. गाँधी मंच तक पहुँचने के लिए लोगों के बीच से गुज़रे. लोगों का अभिवादन करने के लिए उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़े.

एक हिंदू व्यक्ति, जो गाँधी को भारत के विभाजन के लिए गांधी को दोषी मानता था, गांधी के पास आया. उसने पिस्तौल से निशाना साधा और तीन गोलियां चलाईं. जैसे ही गांधी अपने दोस्तों की गोद में गिरे, उनके लबों पर भगवान का नाम था. इस शब्द के साथ, उन्होंने अपने हत्यारे को माफ कर दिया था. हत्यारे को गिरफ्तार कर मौत की सजा दी गई. 

गांधी के बेटे नहीं चाहते थे कि उस हत्यारे को फांसी दी जाए. उन्हें पता था कि गांधी उस के खिलाफ होंगे. उनके पिता ने अपने हत्यारे को माफ कर दिया होगा. पर उनकी बात किसी ने नहीं सुनी. उस हत्यारे को फांसी दे दी गई.

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“मैं जानबूझकर किसी भी चीज को चोट नहीं पहुंचा सकता, खासकर किसी जीवित मनुष्य को, भले ही उसने मेरे साथ बहुत बड़ा गलत काम किया हो.” – गाँधी

अंतिम संस्कार-mahatma gandhi ki kahani

गांधी के अंतिम संस्कार में लगभग पांच लाख लोग शामिल हुए. उनके शरीर को फूलों से ढके एक बड़े सैन्य हथियार वाहक पर ले जाया गया. हवाई जहाज़ों ने आकाश से फूलों की पंखुड़ियां नीचे गिराईं. पूरी दुनिया में, लोगों ने गाँधी की मृत्यु पर शोक व्यक्त किया.

भारत में और पूरी दुनिया भर में गाँधी को भुलाया नहीं जा सका. आज भी भारत के अधिकांश शहरों में गांधी की मूर्तियां और पुतले हैं.

लेकिन गांधी ने भारत के लिए जो लड़ाई लड़ी थी, उससे बहुत कुछ बदला नहीं. अभी भी भारत में अछूत ही सबसे गरीब लोग हैं. वे गरीबी से बच नहीं पाए हैं. महिलाओं के साथ अभी भी अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता है. छोटी लड़कियों को अक्सर अनाथालयों में छोड़ दिया जाता है क्योंकि उनके परिवार उन्हें नहीं चाहते हैं. चरखा पूरी तरह भुला दिया गया है. भारत अभी भी अपना ज्यादातर सामान अमीर, औद्योगिक देशों से खरीदता है.

लेकिन गांधी ने दुनिया को हिंसा से निपटने का एक नया तरीका ज़रूर सिखाया. उन्होंने लोगों एक अच्छा और सरल जीवन जीना भी सिखाया. गाँधी ने कठिन सवाल पूछे और उनमें से कुछ के जवाब खुद दिए. उन्होंने अपने लोगों की मदद करने के लिए और अपने देश को आज़ाद कराने के लिए कड़ी मेहनत की. गाँधी ने दुनिया को बदला! गाँधी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान था कि उन्होंने लोगों को एक-दूसरे को क्षमा करना सिखाया.

“आने वाली पीढ़ियां,शायद ही इस बात पर विश्वास करें कि इस तरह के हाड-मांस का एक आदमी कभी इस पृथ्वी पर चला था.” – एलबर्ट आइंस्टीन की महात्मा गांधी पर टिप्पणी.

महात्मा गांधी समय रेखा

mahatma gandhi history

1869     मोहनदास गांधी, भारत में बम्बई के पास पैदा हए.
1882     युवा गांधी और कस्तूरबाई की शादी हुई.
1887     गांधी इंग्लैंड के कॉलेज में पढ़ने गए. उन्होंने कानून की पढाई की और एक वकील बने.
1891     गांधी भारत लौटे.
1893     गांधी और उनकी पत्नी दक्षिण अफ्रीका गए. वहां वो दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों के नेता बने.
1911   गांधी भारत लौटे. उन्होंने एक सरल जीवन जीने का फैसला किया और अपना धन गरीब लोगों को दिया. फिर उन्होंने भारतीय लोगों के अधिकारों के लिए लड़ाई शुरू की.
1947    भारत ने अंग्रेजों से स्वतंत्रता जीती.
1948    30 जनवरी, 1948 को गांधी का प्रार्थना सभा में कत्ल हुआ.

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