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narad muni stories: एक बार देवताओं ने सोचा नारद जी हम सब को परेशान करते रहते हैं जब जी चाहता है आधा मलकते हैं यहां की वहां की संसार भर के व्यर्थ बातों से हमारा दिमाग चाटते रहते हैं किसी तरह इनसे छुटकारा पाया जाए।

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सभी देवताओं ने अपने-अपने द्वारपाल से कह दिया नारद जी आए तो उन्हें लौटा देना और खबरदार किसी भी सूरत में वे अंदर ना आने पाए।

सारी बात गुपचुप हुई नारद जी को पता ना चल पाया वह शिव से मिलने कैलाश पर्वत पहुंचे, नंदी ने उन्हें रोक दिया कहा आप कहीं और जाकर वीणा बजाइए भगवान शंकर से आप नहीं मिल पाएंगे।

नारद जी सर पटकाया, जब सारी बात का पता चला तो वे क्रोध से जल उठे और भूल गए। पैर भटकाते हुए वे पहुंचे शिरसागर, उन्होंने सोचा चलो विष्णु भगवान से शिकायत करते हैं।

परंतु शिवसागर के बाहर ही गरुड़ नियम का रास्ता रोक लिया नारद जी ने बहुत समझाया की शाप देने की धमकी भी दी परंतु गरुड़ तस से मस ना हुआ।

अब स्वर्ग लोक के सारे द्वार नारद जी के लिए बंद हो गए थे फूलों का एक ही दरवाजा खुला था क्रोध से बढ़ बढ़ाते नारदजी पृथ्वी पर आ पहुंचे उन्होंने सारे पर्वत लांग डाले सारे समुंदर नाथ डाले परंतु फिर भी शांति ना मिली वह देवताओं से अपने अपमान का बदला लेना चाहते थे परंतु कोई रास्ता सूझ नहीं रहा था।

एक दिन नारदजी घूमते घूमते वाराणसी पहुंचे वहां उन्हें पता चला कि एक संत माधवनंद जी हैं वे बड़े पहुंचे हुए हैं ऐसा कुछ नहीं जो उनसे प्राप्त ना हो सकता हो।

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नारद जी तुरंत संत माधव नंद के पास पहुंचे नारद जी ने संत के चरण पकड़ लिए संत माधव नंद ने चकित होकर कहा यह क्या करते हैं! देव ऋषि आप पर ऐसा कौन सा दुखा पड़ा है?

नारद जी बोले यह पूछिए कौन सा दुख नहीं आया अब मैं आपकी शरण में आया हूं जब तक आप कुछ करने का वचन ना देंगे आपके चरण छोडूंगा नहीं।

संत माधवनंद संकट में पड़ गए। नारदजी जो कि कुछ सुनने को तैयार नहीं। हारकर माधव नंद बोले मैं तो स्वयं देवताओं की कृपा का याचक हूं आपको क्या दूं मेरे पास तीन अद्भुत सिद्ध पाषाण हैं हर पाषाण से 3 कामना पूरी होती है। नारद जी आप चाहें तो उन्हें ले ले परंतु देवताओं पर उनका असर नहीं होगा।

इतना कहकर संत माधव नंद कुटिया के अंदर गए। और तीन पाषाण लाकर उन्होंने नारद जी को दे दिए। देखने में वे तीनों साधारण पत्र लगते थे फिर भी नारदजी ने उन्हें अपनी झोली में रख लिया सोचने लगे अब क्या करूं?

अचानक नारद जी के मस्तिष्क में एक योजना बिजली की तरह कौंध गई। वह नगर में जा पहुंचे नगर में एक विशाल भवन से रोने पीटने की आवाज सुनाई पड़ी। नारद जी वहां पहुंचे, पूछने पर पता चला कि नगर का बड़ा शेठ मर गया है। झट से नारद जी ने एक सिद्ध पाषाण निकाला और कामना की नगर सेठ पूरे 100 साल तक जिए।

नगर सेठ तुरंत मुर्दे में से जाग बैठा, नारद जी वहां से चुपचाप खिसक गये। कुछ ही दूर गए थे कि रास्ते में उन्हें एक बूढा भिखारी मिला उसके सारे शरीर में कोढ़ था। नारद जी ने तुरंत दूसरा सिद्ध पाषाण निकाला और कामना की बूढ़ा भिकारी स्वस्थ हो जाए और लखपति बन कर 100 साल तक जिए।

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बूढ़े भिखारी की कायापलट हो गई। उसका कोढ ठीक हो गया और उसकी छोलिया हीरे मोतियों से भर गई। वह हक्का-बक्का रह गया। लोग उसे देखकर दंग थे। नारद जी वहां से भी खिसक गए।

गंगा तट पर पहुंच तीसरे सिद्ध पाषाण को हाथ में लेकर उन्होंने कहा मेरी कामना है मुझे तीनों सिद्ध पाषाण वापस मिल जाए।

एक्सिस पाषाण तो उनकी हथेली में था ही बाकी दोनों सीद्ध पाषाण भी उनके थैली में आ गए। अब नारद जी धरती पर घूम-घूम कर उल्टी-सीधी कामनाएं करने लगे जिसकी मृत्यु आती उसे जीवित कर देते। जिससे लक्ष्मी रूठती उसे हीरे जवाहरात से भर देते। जिसके भाग्य में ब्रह्मा ने संतान नहीं लिखी थी उसे संतान दे देते।

धरती पर होने वाले इस तमाशे से देवलोक में खलबली मच गई। यमराज ब्रह्मा और लक्ष्मी तमतमा ते हुए विष्णु लोग पहुंचे। वे कहने लगे प्रभु यह सब क्या तमाशा हो रहा है। हमारे आदेशों का पालन धरती पर नहीं होता यही होता रहा तो हमको कौन पूजेगा?

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तभी इंद्र वहां से हाथ जोड़कर बोले,” प्रभु अब मैं इंद्र नहीं रहना चाहता। बादल मेरा आदेश नहीं मानते, जहां कहता हूं वहा बरसते नहीं और जहां मना करता हूं वहा पे बरस जाते है।

शिवजी भी विष्णु भगवान के पास ही बैठे थे। कहने लगे हमने नारद का अपमान करके अच्छा नहीं किया। हमने उनसे धरती के हाल-चाल तो मालूम हो जाते थे। वह होते तो सारी बात का पता चल जाता।

शिवजी की बात सुनकर देवता चुप हो गए। उन्हें क्या पता था कि यह सारी करतूत नारद जी की ही है। तय हुआ कि वरुण और वायु जाकर नारदजी को खोज कर बुला लाएं।

दोनों देवता नारद की खोज करने लगे परंतु नारदजी कहीं ना मिले। अंत में भ्रूण और वायु दोनों देवता भूलोक पहुंचे वह कई दिनों तक नाराज की खोज करते रहे आखिर वरुण

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देव ने नारद को देख लिया। नारद जी गंगा स्नान कर रहे थे वरुण देव ने वायु को इशारा किया किनारे पर नारद जी की वीणा रखी हुई थी।

वायु देव वेग से बहने लगे उनके सफर से वीना बज उठी। सुनकर नारदजी भोचाक्के रह गए। उन्होंने वीणा बजाना ही छोड़ रखा था। बजाते भी कैसे विष्णु भगवान से तो वे नाराज थे अब किसके गुण गाते?

वीणा की ध्वनि सुनकर नारदजी भागे भागे किनारे पर आए। उन्होंने देखा कि दोनों देवता खड़े खड़े मुस्कुरा रहे थे। उन्हें देखते ही नारदजी बोले,” अरे आप कब आए देवलोक के क्या हाल-चाल हैं?

वरुण देव और वायु देव ने नम्रता से कहा आपकी कमी खल रही है। आपके बिना सब उदास है, चलिए हम आपको ही लेने आए हैं।

एक बार तो नाराज जी के मन में आया कि टका सा जवाब देकर उन्हें टरका दें परंतु वे ठहरे योगी क्रोध जैसे आया था चला गया ।

नारदजी ने वीणा उठा ली फिर जेब से तीनों सिर्फ पाषण निकाले और कहा अब क्या करूंगा इनका?

इतना कहकर नारद जी ने वे तीनों सिद्ध पाषाण गंगा में फेंक दिए फिर वे वरुण देव और वायु देव के साथ देवलोक की ओर चल पड़े।

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