pandubi ka aviskar kisne kiya, पनडुब्बी का आविष्कार किसने किया

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pandubi ka aviskar kisne kiya: पनडुब्बी आम तौर पर नौसेन्य के द्वारा ही चलायी जाति है। पनडुब्बी का आविष्कार किसी एक व्यक्ति ने नहीं किया है बल्कि यह तो समय और जरुरत के हिसाब से आविष्कार हुआ है। तो जानते है(pandubi ka aviskar kisne kiya) पनडुब्बियो के आविष्कार के बारे में.

pandubi ka aviskar kisne kiya, पनडुब्बी का  संपूर्ण इतिहास

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पनडुब्बी का इतिहास

पनडुब्बी का आविष्कार किसने किया

जॉन हॉलैंड (jhon Holend) – पनडुब्बी के आविष्कारक है।

आखिर पनडुब्बी क्या है?

पनडुब्बी एक प्रकार का पानी में गहराईयों तक जाने वाला जलयान है। क्योकि वह पानी के अन्दर रहकर काम कर सकता है। इसको सबमरीन भी कहा जाता है। यह पानी के निचे और उपर दोनों तरफ चल सकती है।

पनडुब्बी का ज्यादातर इस्तेमाल समंदर की निचे होनेवाली गतिविधियों का पता लगाने के लिए जल सेना द्वारा किया जाता है। उसमे सवार होकर बहोत दिनों तक पानी के निचे रहा जा सकता है। और आवश्यकता पड़ने पर उसे ऊपर सतह पर लाया जा सकता है।

जरुरत पड़ने पर पानी के अन्दर बहोत दिनों तक भी रखी जाती है।

पनडुब्बी के अन्दर सभी पारदर्शी लगे होते है। जिससे उसके अन्दर बैठे हुए समुद्र के निचे सबकुछ दिखाई देता है। और बहोत ही आधुनिक तरीके के उपकरण लगे होते है। जिससे समुंद्र के ऊपर के द्रश्य भी देखे जाते है।

पनडुब्बी डीझल इंजिन या विद्युत मोटर के द्वारा जल के अन्दर चलती है। और परमाणु शक्ति के विकसित हो जाने के कारन अब उसके परिचालन में नाभकीय रीएक्ट का उपयोग होने लगा है। धीरे धीरे अब ये किसी भी देश की नौसेना का विशिष्ट हथियार बन चुकी है।

क्योकि वे पानी के भीतर रहते हुए समस्त सैनिक कार्य करने में सक्षम है। और ये शत्रु के जलयानो पर तारपिड़ो से आक्रमणों करने में उसका उपयोग किया जाता है।

कुछ पनडुब्बियो पर बारह इंच की तोप और एक हवाई जहाज रखने की भी व्यवस्था होती है।

पनडुब्बी के अंदर जीवन के लिए आवश्यक सभी सुविधाए कुत्रिम रूप से उपलब्ध होती है। जैसे सास लेने के लिए कुत्रिम ऑक्सीजन टैंक और कार्बनडायोक्साइड न भर जाए इसके लिए कार्बनडायोकसाईंड अवशोषित उपकरण लगे होते है।

पणडुब्बी के इतिहास के बारे में

विश्व की पहली पनडुब्बी एक डच वैज्ञानिक द्वारा सन 1602 में बनाई गई थी। किन्तु उस समय उसे उद्धोउपकरण रूप में नहीं सोचा गया था।

और (CORNELIUS VON DRIEBLE) कोर्नेलुईस डरेबेल नामक होलेन्ड (HOLEND) वासी ने उस पनडुब्बी में सुधार किया और उसे ज्यादा गतिशील बनाया। और वो पनडुब्बी लकड़ी की बनी थी और उसपर चमडा मढ़ा गया, इसके अगल बगल दो चप्पू लगे हुए थे। जो इसको डुबाते और निकालते थे।

पहेली नोसैनिक पनडुब्बी टटरसन

 पहेली सैनिक पनडुब्बी टर्टलसन 1775 में बनाई गई थी। इसका प्रसिक्षण सफलता से हो गया। और ये पानी के अन्दर रहकर सभी सैनिक कार्य करने में सक्षम थी। इसलिए इसका इस्तेमाल एक वर्ष बाद अमेरिकी क्रांति में किया गया। और पारदर्शी के आविष्कार में पानी में रहते हुए भी उनमे से बहार देखने की सुविधा दी गई। इस प्रकार पनडुब्बी नौसैनिक पनडुब्बियो में भाग लेने योग्य बन गई।

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पनडुब्बियो में बदलाव

सन 1620 से लेकर अब तक पनडुब्बियो की तकनीक और निर्माण में बहोत बदलाव आया शुरुआत में डीझल इंजिन से चलने वाली पनडुब्बियो का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन समय के साथ साथ इसके अन्दर बदलाव किये गए।

सन 1950 में परमाणु शक्ति से चलने वाली पनडुब्बियो ने डिझल से चलने वाली पनडुब्बियो का स्थान ले लिया।

पनडुब्बी पानी से भरे उपरी और निचली वॉल्वो की उपस्थिति पर निर्भर करती है। जैसे जैसे पनडुब्बी के शरीर का घनत्व बढ़ जाता है और उसी प्रकार यह समिद्र की गहराई में उतर सकता है। जब ये फिर से ऊपर उठता है तब वॉल्वो के अंदर संपीडित हवा द्वारा पानी खाली कर दिया जाता है।

यह पनडुब्बी के किनारों पर पंख लगे होते है जिनका उपयोग यात्रा की दिशा को नियंत्रण करने के लिए किया जाता है।

पनडुब्बी आग्मडिस के उछल के नियम पर आधारित है

समुद्र की बेहतरीन नाव पनडुब्बी का सबसे पहेला विचार,

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 पनडुब्बी के विचार का प्रस्ताव करने वाले पहले ब्रिटिश वैज्ञानिक विलियम बॉर्न (williyam byrne) थे। उन्होंने 1578 में एक पुष्तक में उन्होंने एक नाव के डिझाईन का प्रस्ताव रखा। जो पानी के भीतर गोता लगा सके और चल सके।

चालीस साल बाद यूनाइटेड किंगडम में रहने वाले एक डच भौतिक विज्ञानी कॉर्नेलियस वैन ड्रेबेल ने विलियम बॉर्न द्वारा लिखित पुस्तक को देखा इसलिए उन्होंने विलियम बॉर्न के सिध्धांतो को वास्तविकता में बदलने का विचार किया।

इसके बाद इंग्लेंड के राजा जेम्स प्रथम (JAMES PRATHAM) के समर्थन से ड्रेबेल ने जल्दी से एक छोटी नाव बनाई जो पानी में डूब और तैर सकती थी। नाव का शरीर एक लकड़ी का फ्रेम होता है। जो तेल से सना हुआ और हाईट की परत से ढाका हुआ होता है। नाव में सवारी और यात्री बैठ सकते है।

गोताखोरों और नाव के तैरने की समस्या को हल करने के लिए नाव पर कई भेड की खाल की  थेलिया होती है। जब नाव गोता लगाने जा रही होती है, तब थैलियो में पानी भर दिया जाता है और जब नाव तैरने वाली होती है तो उस थैली को निचोड़ दिया जाता है।

1620 में ड्रेबेल ने लोगो को अपना आविष्कार दिखाने के लिए एक प्रदर्शनी आयोजित की 1620 से 1624 की अवधि के दौरान ड्रेबेल ने टेम्स पर आविष्कार की गई नौका पर कई नौकायान परिक्षण किये, जिससे पानी के निचे नेवीगेसन (navigation) की संभावना की पृष्टि हुई।

 वर्तमान में आम तौर पर ये माना जाता है पहली पनडुब्बी के आविष्कारक nedharlend के कॉर्नेलियस वैन ड्रेबेल थे।

1717 में अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में अमेरिकी डेविल हुस नेल द्वारा अविष्कार की गई पनडुब्बी टर्टल में से पहेली बार एक नौसैनिक दुश्मन के जहाज पर हमला किया।

1880 में अमेरिकी आविष्कारक फुल्टन ने फ्रांसीसी नौशेना के लिए पहेली पाल सुसर्जित पनडुब्बी नोटेलस का निर्माण किया।

 

पनडुब्बी जहाज का जनक कौन है? , pandubi ka aviskar kisne kiya

जॉन हॉलैंड (jhon Holend) – पनडुब्बी के आविष्कारक है।

उन्नीसवि सदी के अंत में विभिन्न देशो की पनडुब्बी आविस्कराकोने यंत्रवर्त संचालित पनडुब्बियो को विकसित करना शुरू किया इसमे सबसे अधिक प्रतिनिधि सयुक्त राष्ट्र अमेरिकामें एक मध्य विद्यालय के शिक्षक jhon hollend थे। जोंन होलेन्ड ने 1875 में पहेली यांत्रिक रूप से संचालीत पनडुब्बी को सफलता पूर्वक संचालित विकसित किया जिसका नाम HORLAND 1 रखा गया। ये पनडुब्बी स्टील प्रोप्रसन का प्रयोग करती थी। सतह पर नेविगेट करते समय गेसोलीन इंजिन द्वारा संचालित ये पनडुब्बी पानी के भीतर नेविगेट करते समय एक इलेक्ट्रिक मोटर का उपयोग करती है। इसके मोटर को पावर देने के लिए एक बेटरी (bettery) का उपयोग किया जाता है।

तो पनडुब्बी के सतह तक उठाने पर गेसोलीन इंजिन बेटरी को चार्ज कर सकता है।

इसके अलावा होरलेंट बोट पहेली बार नौसेना के नवीनतम हथियार से सुसज्जित था। जिसने पनडुब्बी को सतह के जहाजो को डुबोने की क्षमता दी।

होरलेंन बोट की उपस्थिति ने आधुनिक पनडुब्बियो के जन्म को चिन्हित किया। इस कारण से जोंन होलेन्ड को पीढियों द्वारा आधुनिक पनडुब्बियो का जनक कहा जाता था।

 

परमाणु उर्जा के विकास में पनडुब्बी के परिचालन में क्रांति कर दी

नोटेलस पहेली पनडुब्बी है जिसमे शक्ति प्राप्त करने के लिए नाभकीय रिएक्टर का उपयोग किया गया और नाभकीय पनडुब्बी में न तो वायु की आवश्यकता पड़ती है और न ही इंधन गेसो के निकास की समस्या रहती है। नाभकीय पनडुब्बी के अन्दर पुराणी पनडुब्बी के मुकाबले अधिक खाली स्थान होता है। क्योकि इसके अन्दर केवल नाभकीय रिएक्टर ही होते है और परमाणु उर्जा से संचालित पनडुब्बी के जितने फायदे है उतने नुकशान भी है। क्योकि रिएक्टर बहोत ही ज्यादा खतरनाक किरण छोड़ते है। की इसके कारण मनुष्य का दुर्घटना ग्रस्त होना लगभग असंभव होता है।

और आज समुद्री जल से ऑक्सीजन ग्रहण करने वाले पनडुब्बियो का भी निर्माण कर लिया गया है। इन दो महत्व पूर्ण आविष्कारो से पनडुब्बी निर्माण क्षेत्र में क्रांति सी आ गई है। क्योकि आधुनिक पनडुब्बिया कई सप्ताह या कई महीनो तक पानी के भीतर रहने में सक्षम हो गई है।

और आज पनडुब्बियो का इस्तेमाल पर्यटकों के द्वारा भी किया जाता है। वो समुद्री जीवो को देखने के लिए पनडुब्बियो का इस्तेमाल करते है।

हर विकसित देश की नौशेना के बेड़े के अन्दर पनडुब्बियो को शामिल किया जा रहा है। क्योकि देश के बिच होनेवाले टकराव से समुद्री सीमा के सुरक्षा के लिए पनडुब्बीयो का इस्तेमाल जरुरी हो गया है।

दुनिया की सबसे बड़ी खतरनाख पनडुब्बी

दुनिया के सबसे घातक हथियार रखने वाले देश रुस ने अपने जकिरे में एक और खतरनाख शस्त्र जोड़ लीया है। रूस ने दुनिया की सबसे बड़ी धातक पनडुब्बी का आविष्कार किया है। ये पनडुब्बी सबसे ज्यादा दुरी तक मार करने वाली पहेली पनडुब्बी है इस पनडुब्बी का नाम क्नायास व्लादिमीर है इसे प्रिन्स व्लादिमीर भी कहा गया है।

ऐसा अनुमान है की इस पनडुब्बी को अगले साल तक रुसी नौसेना में शामिल कर लिया जाएगा।

फिलहाल अमेरिका के पास सबसे ज्यादा हथियारों से लेस पनडुब्बी है जिसकी मारक क्षमता चार हजार आठसो छयालिस मिल तक है। यानी के लगभग सात हजार आठ्सो किलीमीटर तक, इस पनडुब्बी में 20 पानी में मारे जाने वाली मिसाइल लगाई गई है। जो इस समय की दूसरी पनडुब्बियो से जयादा है।

इसमे 96 से लेकर 200 परमाणु मिसाइले दागी जाती है। जिसमे कुल सो से डेढ़सो किलो तक विष्फोटक होता है। ये हिरोशिमा में फेके गए बोम से दस गुना ज्यादा शक्तिशाली होगा ये सबमरीन पानी में 400 मीटर तक की गहराई तक गोता लगा सकती है। जिसके चलते ये राडार की रेंज में भी नहि आ पाएगी।

इस विशालकाय पनडुब्बी का निर्माण 2012 में शुरू हुआ था।

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भारतीय पनडुब्बिया

भारत ने पहेली परमाणु पनडुब्बी रूस से किराये पर ली थी। इस पनडुब्बी को थोड़े साल बाद वापस कर दिया गया।

वर्तमान समय में भारत के पास नव सिन्धु होस्ट क्लास या किलो क्लास डीझल इलेक्ट्रिक पनडुब्बिया है इन पनडुब्बियो का निर्माण रूस के साथ भारतीय रक्षा मंत्रालय बिच हुए समझोते के अंतर्गत बनाया गया है।

 

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