shikshaprad kahaniyan

शिक्षाप्रद हिन्दी कहानिया बुद्धिमान लड़का, सुनहरा हिरण, शक्तिशाली बेल, एकता में बल, दयालु हाथी वगेरे………बेहतरीन shikshaprad kahaniyan का संग्रह यहाँ से पढ़ सकते है दोस्तों…….

 1 बुद्धिमान लड़का

यह एक shikshaprad kahaniyan है

एक शहर में चौला नाम का बुध्धिमान अमीर था। एक बार जब वह राजा से मिलने जा रहा था,तब उसे सड़क पर मरा हुआ चूहा दिखाई दिया। वह ग्रह नक्षत्रो को देखते हुए बोला-“कोई तेज दिमाग (निगाहों) वाला इस चूहे से भी धन कमाकर अमीर बन सकता है।”

उसी समय एक गरीब बुध्धिमान लड़का वहा से निकल रहा थाबुद्धिमान लड़का चौला के शब्द सुनकर उस लडके ने सोचा, “ जरुर इस अमीर आदमी ने अपनी महेनत और बुध्धि से खूब पैसा कमाया होगा, तभी वह यह बात सोचकर वो कह रहा होगा।”

shikshasprad kahaniya
budhdhiman ladaka
मरा हुआ चूहा उठाया

यही सोचकर उसने मरा हुआ चूहा उठाया और बिल्लियों के भोजन की दुकान पर जाकर बेच दिया।चूहे के बेचने पर उसे एक सिक्का मिला। जिससे उसने गुड खरीदा। गुड और पानी लेकर वह बगीचे के उस रास्ते पर बैठ गया जहां से बहुत सारे माली काम करके बाहर निकलते थे। वह लड़का उन मालियों को गुड और पानी देता था, और सब मालि उसे एक एक फूल देते थे, जिन्हें बेचकर वह और ज्यादा गुड खरीद लेता था।

shikshaprad kahaniyan in hindi

अब वह वही बैठने लगा और सभी लोग उसे पहचानने लगे थे। सभी माली उसे पौधे और फूल देते थे जिन्हें वह बेच देता था। इस तरह उसने आठ सिक्के कमा लिए।

भारी तूफान shikshaprad kahaniyan

एक दिन शहर में बहुत भयानक तूफान आया और सारा बगीचा सूखी पत्तियों और टहनियों से भर गया। सभी माली परेशान थे कि बगीचे को कैसे साफ किया जाए। उनकी परेशानी को समझकर लड़का बोला- “इस बगीचे को मैं साफ करूंगा। बदले में आप मुझे यह सारी सूखी पत्तियां और टहनिया दे देना। “सभी माली इस बात पर सहमत हो गए। लड़केमैं खेल रहे बच्चों को बुलाया और  उनसे सारा बगीचा साफ करवा कर,  सुखी टहनियों और पत्तियों का ढेर बंधवा कर बगीचे के बाहर रखवा दिया । बदले में उसने बच्चों को थोड़ा सा गुड दे दिया।

उसी समय एक कुम्हार वहां से जा रहा था। उसे मिट्टी के बर्तन पकाने के लिए सुखी लकड़ी और पत्तियों की सख्त जरूरत थी। उसने लड़के को सोलह सिक्के दिया और वह ढेर खरीद लिया । अब लड़के के पास सोलह सिक्के हो गए।

अब उस लड़के ने वही एक दुकान बना ली। जब माली अपने काम से लौटते तो वे उससे गुड और पानी लेते थे। सभी उससे पूछते-तुम हमें गुड और पानी देते हो बदले में हम केवल फूल देते हैं। बताओ, हम तुम्हारे लिए और क्या कर सकते हैं? लड़का कहता समय आने पर बताऊंगा।

कुछ समय बाद एक व्यापारी अपने पांच] सौ घोड़े सवारों के साथ शहर में व्यापार करने के लिए आया। जब लड़के को इस बात का पता चला तब उसने सभी मालियों से कहा कोई भी घास ना बेचे और एक एक घास की पुली उसे दे दे। सभी ने उसकी बात मान ली।

जब व्यापारी वहां आया तब उसे घोड़ो को खिलाने के लिए घास की जरूरत पड़ी। उसने लड़के को हजार सिक्के दिए और उसने वह घास खरीद ली।

बड़े व्यापारी समुद्री जहाजो में

कुछ समय बाद, बंदरगाह में कम करने वालो से लडके को पता चला की कुछ बड़े व्यापारी समुद्री जहाजो में कीमती सामान लेकर, व्यापार करने के लिए आ रहे है। वह लड़का इस सुनहरे मौके को खोना नहीं चाहता था। उसने बहुत सुंदर बग्गी तथा कुछ सेवक किराए पर लिए। वह बड़े ठाठ-बाट से बग्गी में बैठकर तंबू में गया और अपने सेवको को आज्ञा दी कि वे इस बड़े दरवाजे से एक-एक करके व्यापारियों को अंदर लाए। जब व्यापारियों को पता चला कि वहां एक बहुत बड़ा व्यापारी है, तब बाहर वाले व्यापारी उससे मिलने पहुंचे।

सेवकों ने एक-एक करके उन्हें अंदर पहुंचाया तथा लड़के से मिलवाया। व्यापारी लडके के  ठाट-बाठ देख कर बहुत प्रभावित हुए, और उन्होंने अपना सामान उसे बीच दिया। जब शहर के अन्य व्यापारियों को इस बात का पता चला, तब वे वहां पहुंचे। परंतु तब तक तो सारा सामान वह लड़का उन  से खरीद ही चूका था। व्यापारियों को अब उसी से सामान खरीदना पड़ा। इस तरह उसने बहुत सारा धन कमाया।

इस तरह वह लड़का एक अमीर आदमी बन गया। उसने वह सब कुछ पा लिया जो वह चाहता था। उसने सोचा, मुझे उसी व्यक्ति को धन्यवाद देना चाहिए, जिसने मुझे सही रास्ता दिखाया था। वह कुछ धन और उपहार लेकर चौला के पास पहुंचा और बोला कृपया आप यह स्वीकार कीजिए । चौला ने लड़के से पूछा- ” यह सब तुम मुझे क्यों देना चाहते हो?”

लड़के ने बड़ी नम्रता से उत्तर दिया- “यह सब मैंने आप से ही आशीर्वाद से कमाया है। “और उसने चौला को मरे चूहे से लेकर अब तक की सारी बात बताई। चौला सब सुनकर बहुत प्रभावित हुआ और उसने अपनी लड़की का विवाह उस लड़के से  करके उसे अपना दामाद बना लिया। चौला की मृत्यु के बाद वह चौला की सारी संपत्ति का मालिक बन गया।

शिक्षा: बुद्धिमान अपनी बुद्धि के बल पर कहीं भी पहुंच सकता है।

2 सुनहरा हिरण

 एक जंगल में एक सुनहरा हिरण अपने पांच सौ साथियों के साथ रहता था।  उसके सिंग चांदी की तरह सफेद,  पूछ याक की तरह और शरीर एक बछड़े के समान था ।  वह जंगल जिस राज्य में था,  उसकके राजा को हिरन का मांस बहुत पसंद था ।

वह राजा प्रतिदिन अपने सैनिको के साथ शिकार के लिए जाता और एक हिरन मारकर अपने खाने के लिए लाता था। सभी लोग राजा की इस आदत से परेशान थे। उन्होंने सोचा की जंगल के सारे हिरनों को इकठ्ठा करके राजा के बगीचे में बंध कर दिया जाये।

सभी लोग राजा के पास पहुचे और कहा- ” महाराज !  प्रतिदिन शिकार पर जाने से समय खराब होता है और काम का भी नुकसान होता है । इसलिए हमने आपके बगीचे में हिरणों को बंद कर दिया है । अब आपको शिकार के लिए प्रतिदिन जंगल नहीं जाना पड़ेगा और खाने के लिए हिरण भी मिल जाएगा ।”

 shikshaprad kahaniyan
shikshaprad kahaniyan

 इस प्रकार  लोग प्रतिदिन शिकार पर जाने से बच गए । वह सभी बहुत खुश थे । राजा ने जब बगीचे में उन  हिरनों के बीच एक सुनहरे हिरण को देखा तो वह उसे बहुत पसंद आया।  राजा ने सुनहरे हिरण को जीवन-दान दे दिया ।

  अब राजा प्रतिदिन बगीचे में अपना धनुष-बाण लेकर जाता और एक हिरण को मार कर ले आता।  जब राजा बगीचे में जाता तो उसे देखकर  हिरनों में भगदड़ मच जाती,  जिससे एक-दो हिरण और मर जाते थे । यह देख कर सारे हिरन,  सुनहरे हिरण के पास  जाकर बोले- ” जब हमें मरना ही है तो हम राजा के तीर से क्यों मरे?  हम एक-एक करके अपने आप ही राजा के पास चले जाएंगे ।”

सोने का सुनहरे हिरण

 सुनहरे हिरण ने यह बात राजा को कहीं तो  राजा इस बात पर सहमत हो गया ।  इस प्रकार एक एक करके हिरण राजा के पास जाने लगे। एक बार एक गर्भवती हिरणी की बारी आई । वह सुनहरे हिरण के पास गई और कहने लगी- ” आज मेरी बारी है । मैं और मेरा बच्चा दोनों ही मारे जाएंगे । इसलिए आज आप मेरे बदले किसी और को भेज दीजिए ।”

 उस सुनहरे हिरण ने उससे कहा- ”  जाओ, तुम आराम करो। ”  और वह खुद ही राजा के पास चला गया । राजा ने उसको देखकर कहा हमने तो तुम्हें जीवन दान दिया है फिर तुम यहां क्यों आए हो?

 वह  हिरण ने उत्तर दिया-”  महाराज!  आप बुरा  ना माने ,  आज एक गर्भवती हिरणी की बारी थी । उसको और उसके बच्चे को बचाने के लिए,  मैंने अपना त्याग किया है ।

राजा ने कहा – ” मेरे प्यारे हिरन , मैंने आज तक इतना दयालु हिरन कही नहीं देखा। मै तुम्हारी इस दयालुता पर प्रसन्न हु । मै गर्भवती हिरनी को भी जीवन-दान देता हु। “

हिरन बोला – “महाराज ! हिरन तो जंगल में भी है?”

राजा बोला – ” मेरे प्यारे हिरन ! में जंगल के सारे हिरनों को भी जीवन-दान देता हु। “

सुनहरा हिरन बोला -” क्या आप केवल हिरनों को या अन्य सभी जंगली जानवरों को भी जीवन-दान देंगे?”

राजा बोला -” मै सभी जानवरों को जीवन-दान देता हु।”

हिरन बोला -” क्या पक्षियों को भी ? “

राजा बोला – ” हा, मै सभी छोटे-छोटे और बड़े से बड़े पक्षियों को जीवन दान देता हु।”

हिरन बहोत खुश हुआ और राजा को धन्यवाद दिया। इस प्रकार उसने सारे पशु-पक्षियों को बचा लिया । तब वे राजा के बगीचे से जंगल में चले गए और आजाद होकर ख़ुशी से रहने लगे।

शिक्षा : त्याग का फल मीठा होता है ।

3 शक्तिशाली बेल

shikshaprad kahaniyan

 एक गरीब ब्राह्मण था । एक दिन दक्षिणा में उसे एक बछड़ा मिला । उसने उसे बहुत प्यार से अपने बेटे की तरह पाला-पोसा । वह ब्राह्मण उसे बेटा कह कर बुलाता था। उसने उसका नाम ‘नंदी विशाल‘ रखा ।

 बछड़ा बड़ा होने पर एक शक्तिशाली और सुंदर बेल बन गया । एक दिन नंदी विशाल ने सोचा, ” मेरे मालिक ने मुझे अपने बच्चे की तरह बड़ी मेहनत से पाला है, इसलिए मुझे भी उनके लिए कुछ करना चाहिए।”

 कुछ समय बाद नंदी विशाल ने अपने मालिक से कहा- ” मालिक,  आप कैसे अमीर आदमी के पास जाओ जिसके पास सौ बैल गाड़ियां हो ।  उससे कहो कि मेरे पास एक ऐसा बिल है, जो तुम्हारी सौ बैल गाड़ियों को उन में रखे सामान सहित, अकेला ही खींच सकता है । अगर उसे विश्वास ना हो तो आप उससे एक हजार सिक्कों की शर्त लगा लेना ।”

 shikshaprad kahaniyan
shikshaprad kahaniyan in hindi

ब्राह्मण ने नंदी की  बात सुनी 

 जब ब्राह्मण ने नंदी की  बात सुनी  तो  वह उसे ठीक लगी। वह एक अमीर आदमी के पास पहुंचा । उसने अमीर आदमी से कहा, ”  आपको क्या लगता है कि सबसे ताकतवर बेल किसके पास होगा?”  अमीर आदमी ने बड़े गर्व से कहा, ” मेरे सिवाय इस पूरे गांव में सबसे ताकतवर बेल रखने की कोई हैसियत नहीं रखता ।” अमीर को उसकी बात पर विश्वास ही नहीं हुआ और उसने ब्राह्मण से 1000 सिक्के की शर्त लगा बैठा।

ब्राह्मण ने नंदी विशाल को नहला-धुलाकर तैयार किया और गले में ताजे फूलों की माला पहनाई, और  सामान से लदी  100 गाड़ियां में जोत दिया।  ब्राह्मण ने बहुत ही घमंड से कहा – ” चल दुष्ट बैलगाड़ियां खींच।”

नंदी विशाल को यह सुनकर अच्छा नहीं लगा और वह सोचने लगा कि मालिक ने मुझे दुष्ट क्यों कहा?  उसने गाड़ियां नहीं खींची । ब्राह्मण बार-बार कहता रहा, परंतु नंदी विशाल वही पैरों को जमा कर खड़ा रहा ।

ब्राह्मण क्या करता, उसने हार मान ली और अमीर आदमी को 1000 सिक्के देकर वहां से चुपचाप घर की ओर चल दिया ।  नंदी विशाल भी उसके पीछे पीछे चल पड़ा।

 घर पहुंचकर ब्राह्मण ने नंदी विशाल से कहा- ”  आज तुम्हारे कारण मुझे 1000 सिक्कों का नुकसान हो गया । ” नंदी विशाल ने कहा- ”  मालिक,  मैं बचपन से ही आपके साथ हूं, क्या मैंने कभी कोई नुकसान किया,  किसी कोचिंग मारा,  कोई चीज तोड़ी या कहीं कोई गंदगी की?”

 ब्राह्मण ने कहा- ” नहीं बेटा ना,  ऐसे तो तूने कभी मेरे साथ गलत  कुछ नहीं हुआ।”

 नंदी ने कहा- ” मुझे बहोत बुरा लगा, तो फिर आपने मुझे दुष्ट किसलिए कहा,  मेरा अपमान क्यों किया?  मुझे बुरा लगा और मैंने गाड़ियां नहीं खींची । अब आप फिर से उस अमीर आदमी के पास जाकर 2000 सिक्के का शर्त लगाए ।  मैं गाड़ियां खींच लूंगा,  आप मुझे दुष्ट नहीं कहना ।”

 नंदी विशाल की बात समझ कर, ब्राह्मण अमीर आदमी के पास गया । अमीर आदमी ने खुशी-खुशी दो हजार सिक्को की शर्त मान ली।  ब्राह्मण ने फिर से नंदी को नहला-धुलाकर ,  गले में घंटीया बांधकर, फूल माला पहनाई गई । उसे गाड़ियों में जोत कर ब्राह्मण ने बहुत ही प्यार से उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा- ”  बेटा विशाल! यह सौ गाड़िया खीचकर आपना शक्ति प्रदर्शन कर दे और हम अपना हरे हुए एक हजार सिक्के भी तो वापस पाना है इसलिए हमको यह शर्त जितना है ।”

 नंदी विशाल अपने मालिक के प्यार भरे शब्द सुनकर बहुत खुश हुआ और उसने बहुत शान से गाड़ियों को खींच कर दिखा दिया । इस बार अमीर आदमी अपने 2000 सिक्के हार गया । उसने ब्राह्मण को 2000 सिक्के दिए और नंदी विशाल को शाबाशी दी । इस प्रकार ब्राह्मण का नुकसान पूरा हो गया और 1000 सिक्के का लाभ भी ।

 शिक्षा:  जब भी बोलो,  मीठा बोलो,  कड़वा नहीं ।

 4 एकता में बल

 एक जंगल में बहुत सारी बटेर रहा करती थी । एक बार एक शिकारी की नजर उन पर पड़ी । उसने दाना डालकर जाल फेंका जिससे कुछ बटेर जाल में फंस गई । शिकारी ने उन्हें ले जाकर बाजार में बेच दिया । इस प्रकार वह प्रतिदिन बटेरो को पकड़ता और बाजार में बेच देता,  जिससे उसकी अच्छी कमाई हो जाती थी ।

shikshaprad kahaniyan hindi
shikshaprad kahaniyan hindi mein

 जंगल में अब बटेरो की संख्या कम होने लगी । तब मुखिया बटेर ने सबको इकट्ठा किया और कहा कि यह  शिकारी हम को पकड़कर हमारी संख्या कम करता जा रहा है । मेरा एक सुझाव है अगर सभी बटेर मान ले तो यह शिकारी कभी किसी बटेर को नहीं पकड़ सकेगा ।

 सारी बटेर मुखिया की बात को ध्यान से सुनने लगी । उसने कहा- ” जब शिकारी जाल फेंके तब तुम सभी अपनी चोंच में जाल  का  धागा फसाना और जाल लेकर उड़ जाना । उस जाल को तुम झाड़ियों में छोड़ देना । जब जाल उनमें फस जाएगा, तब तुम उसमें से निकल आना ।”

 सभी बटेरे मुखिया की बात समझ गई और उन्होंने तय किया कि वह मुखिया के कहने के अनुसार ही करेंगी ।

 शिकारी आया, उसने जाल फेंका और बहुत सारी बटेर उसमें फंस गई । उन्होंने मुखिया की बात याद रखें और जाल को झाड़ियों में फंसा कर सब जाल से निकलकर उड़ गई ।

शिकारी देखता ही रह गया । वह उनके पीछे भागा भी परंतु उसके हाथ कुछ भी नहीं लगा। उसका जाल भी झाड़ियों में फंस कर फट चुका था।

अब बटेर ऐसा ही करने लगी । शिकारी को खाली ही घर लौटना पड़ता था । शिकारी के घर में खाने को भी परेशानी होने लगी । तब शिकारी की पत्नी ने कहा- ” आप कोई भी दिन अब पैसा लेकर नहीं आते, रोजाना कमाया हुआ पैसा कहां दे आते हैं  ।”

शिकारी ने कहा – ” प्रिय! 

मैं पैसा कहीं भी नहीं दे कर आता । क्या करूं?  आजकल बटेरो में एकता हो गई है । वह सब मेरा जाल ही लेकर उड़ जाती है । जिस दिन उनमें एकता समाप्त हो जाएगी, उसी दिन से मैं खाली हाथ घर नहीं आऊंगा  । तुम चिंता मत करो ।”

एक  दिन बटेर दाना चुग रही थी कि अचानक एक बटेर दूसरे से टकरा गई।उस बटेर ने गुस्से से दूसरे बच्चे से पूछा- “तुम मुझ पर क्यों कुधी? “दोनों आपस में लड़ने लगी। उन्हें देखकर बाकी बटेर भी शोर मचाने लगी और एक दूसरे से कहने लगी- “क्या तुम जाल उठा सकती हो?”

यह सब देखकर मुखिया बटेर ने उन को समझाने की कोशिश की पर किसी ने भी उसकी बात नहीं सुनी,न हीं मिल कर रही, लड़ झगड़ कर सब अलग हो गई।तब मुखिया बटेर कुछ अपने कुछ साथियों को साथ जंगल में चली गई।

कुछ दिनों बाद शिकारी आया और उसने दाना डालकर जाल फेंका। बटेर जाल में आ गई। एक ने दूसरे से कहा, तुम जाल उठाओ, दूसरे ने तीसरे से कहा, तुम जाल उठाओ। सब आपस में यही कहते रहे, पर किसी ने भी जाल नहीं उठाया।शिकारी ने बहुत ही आसानी से उनको पकड़ लिया और बाजार में बेच दिया।

बटेरो में एकता नहीं रही, इसलिए वह शिकारी के हाथों पकड़े गए।अगर उन्होंने मुखिया बटेर की बात मान ली होती, तब उन्हें यह दिन नहीं देखना पड़ता।

शिक्षा: एकता में बल है।

shikshaprad kahaniyan

5 चालाक सारस

 किसी जंगल में अनेक जल के प्राणियों से भरा एक तालाब था । वहां रहने वाला एक बगुला  बुड्ढा होने के कारण मछलियों को पकड़ने में असमर्थ हो गया । भूख से व्याकुल होकर वह नदी के किनारे बैठ कर रोने लगा । उसी समय एक केकड़े ने उस से रोता देख कर पूछा- ” मामा !  आज तुम रो क्यों रहे हो? ”  वह बोला- ”  तुमने ठीक देखा । अब मछलियों को खाने में मुझे बहुत वैराग्य हो गया है और मैंने मरने का व्रत ले लिया है । अब मैं पास में आई हुई मछलियों को भी नहीं खाऊंगा ।”

 यह सुनकर केकड़ा  बोला- ” मामा !  तुम्हारे वैराग्य का कारन क्या है? ”  वह बोला- ”  आज मैंने ज्योतिषी से सुना है कि अगले 12 साल तक बारिश नहीं होगी । इस तालाब का पानी जल्दी सूख जाएगा । जिससे सारे प्राणी नष्ट हो जाएंगे । मैं उनका वियोग सहन करने में असमर्थ हूं । इसी कारण मैंने यह मरने का व्रत ले लिया है । इस समय छोटे तालाब के सभी प्राणी अपने परिवार को बड़े तालाबों में ले जा रहे हैं । परंतु इस तालाब के पानी निश्चिंत है ।”

यह बात सुनकर केकड़े ने दुसरे प्राणियों से उसकी बात बताई। डर से व्याकुल होकर सारे प्राणी उसके पास आकर पूछने लगे – ” मामा ! क्या हमारे बचने का कोई उपाय है ? ” बगुला बोला -” इस तालाब से थोड़ी ही दूर एक बहोत बड़ा बहोत पानी से भरा हुआ बहोत बड़ा सरोवर है। जो पच्चीस साल बारिश न होने पर भी नहीं सूखेगा।  इसलिए यदि कोई मेरी पीठ पर चढ़े तो मैं उसे वहां ले जाउ । ” उसकी बात का विश्वास करके चिल्लाते हुए सब उसके चारों और जमा हो गये ।

दुष्ट आत्मा बगुले

 तब उस दुष्ट आत्मा बगुले ने कुछ पानी के जानवरों को  पीठ पर चढ़ा लिया और तालाब से थोड़ी दूर जाकर चट्टान पर रख रख कर अपनी इच्छा अनुसार खा लिया । इस प्रकार वह अपनी आजीविका चलाने लगा । 1 दिन केकड़े ने कहा- ”  मामा! पहले मेरे साथ आपकी बात हुई थी, परंतु आप मुझे छोड़कर दूसरे प्राणियों को क्यों ले जा रहे हो?  आज आप मुझे ले चलिए ।”  बगुले ने केकड़े को पीठ पर चढ़ा लिया और उस चट्टान की ओर चल दिया । केकड़ा दूर से उस चट्टान के आसपास मछलियों की हड्डियां को देखकर उसे पूछने लगा- ”  मामा ! वह तालाब कितनी दूर है? “

 वह मूर्ख बगुला भी ऐसा समझ कर कि यह भी जल में रहने वाला प्राणी है और जमीन में बलवान नहीं होगा, हंसता हुआ बोला- ” दूसरा कोई तालाब नहीं है यह मेरी जीविका का साधन है, तुमको भी मै इसी चट्टान पर रख कर खा जाऊंगा ”  । उसके यह कहने पर केकड़े ने अपने दोनों दातों से उसकी गर्दन दबा दी । जिससे वह मर गया ।

 उस बगुले की गर्दन को काटकर लिए हुए वह धीरे-धीरे अपने तालाब में पहुंचा । तालाब में रहने वाले ने पूछा- ”   तुम क्यों लौट आये?  मामा अभी नहीं लौटे । वे देर क्यों लगा रहा है । हम बहुत उत्सुकता से हर क्षण उसका इंतजार कर रहे हैं। ” उनके ऐसा कहने पर केकड़े ने कहा- ”  झूठे बगुले ने हमें थक कर थोड़ी ही दूर एक चट्टान पर यहां के सभी प्राणियों को खाना खा डाला है । आयु शेष होने के कारण मैं उस विश्वासघाती का उद्देश्य जानकर उसकी गर्दन काट कर ले आया हूं ।

 शिक्षा:  ज्यादा चालाकी से अपना नुकसान भी हो सकता है ।

shikshaprad kahaniyan

6 दयालु हाथी

हिमालय के जंगलो में एक सफेद हाथी रहता था। उसके बहोत बड़े-बड़े दांत थे। उसकी आँखे इस तरह थी जैसे की दो नगीने जड़े हो। उसका मुह लाल था और सूड सोने के चमकते भाले के समान थी। उसकी टांगे इस प्रकार लगती की जैसे उन पर मोम लगाया गया हो। वह देखने में सबसे सुन्दर लगता था। सारे हिमालय में उस जैसा कोई भी हाथी नहीं था। वह सब हाथियों का मुखिया था।

वह बहोत बार बहोत समय से मुखिया बन बन कर थक चूका था। उसने दुसरे हाथी को मुखिया बनाया और अपना जीवन दूसरो की सहायता करने के लिए तथा कुछ पल एकान्त में रहने के लिए वह घने जंगलो में चला गया।

एक बार एक आदमी अपना रास्ता भूलकर घने जंगलो में भटक गया और जोर-जोर से रोने लगा। जब सफेद हाथी ने उसका रोना सुना, तो वह उसके सामने गया। आदमी डर के मारे भागने लगा। हाथी समझ गया की वह आदमी मुझसे डर रहा है। हाथी रुक गया। अब आदमी समझ गया की हाथी उसे मरना नहीं चाहता है। हाथी ने धीरे धीरे आदमी के पास पहोचकर कहा-“ चलो अब में तुम्हे जंगल से बहार छोड़ आता हु।“ हाथी ने उसे अपनी पीठ पर बैठा लिया। रस्ते में हाथी ने कहा की तुम शहर में किसीको भी मेरे बारेमे मत बताना।

हाथी बहोत भोला है

       पर यह आदमी बहोत चालाक था। उसके मन में यह लालच आ गया की किसी भी तरह हाथी के दांत उसे मिल जाए। उसने सोचा जंगल में फिर आना पड़ेगा। इसलिए जंगल के रस्ते पहचानने के लिए वह कुछ-न-कुछ निशानी बनाने लगा। हाथी ने आदमी को जंगल के बहार छोड़ दिया और वापिस जंगल में लौट आया।

शहर में लौट कर आदमी सीधा हाथी दांत के बाजार में गया। एक दुकान पर पहुचकर उसने दुकान के मालिक से पूछा – “ भाई ! क्या तुम जिंदा हाथी के दांत खरीदोंगे?”

दुकानदार ने कहा- “ क्या कह रहे हो भाई? जिंदा हाथी के दांत? अरे ! वह तो बहोत कीमती होते है! कहा है, लाओ? मै उन्हें खरीदूंगा।“

लालची आदमी ने एक आरी खरीदी और जंगल में पहोच गया। आदमी को देखकर हाथी ने कहा-“ अब तुम यहाँ क्यों आ गए?” आदमी बोला- “ मै बहोत गरीब हु। अगर तुम मुझे आधा दांत दे दो तो मै उसे बेचकर कुछ धन कम लूँगा और अपना जीवन कांट लूँगा।“

हाथी बोला-“ ठीक है। तुम आधा दांत ले लों, पर मै अपना दांत कैसे निकालूँगा?”

आदमी बोला-“ दांत काटने के लिए , मै आरी अपने साथ लाया हु।“

दयालु हाथी सूड उठाकर बैठ गया और आदमी ने आधा दांत कट लिया। हाथी ने कहा-“ यह मत समझना की मुझे आपना दांत प्रिय नहीं है। इसलिए में अपना दांत दे रहा हु। यह मेरे को बहोत काम आते है, परंतु फिर भी तुम्हारी सहायता के लिए मै ऐसा कर रहा हु।“

इस प्रकार हाथी ने अपना दांत देकर उस आदमी को जंगल के बहार छोड़ दिया। वह आदमी ख़ुशी-ख़ुशी, हाथी दांत के बाजार में गया और उस दांत को बेच दिया। दांत बेचकर उसने जो धन कमाया, उसे बुरे कामो में बरबाद कर दिया। कुछ समय बाद सारा धन ख़त्म हो गया। वह लालची दुष्ट आदमी फिर से हाथी के पास पहोच गया और रोते हुए बोला-“ दांत बेचकर जो मैंने धन कमाया था, वह तो कर्ज चुकाने में ही समाप्त हो गया। अगर तुम मुझे और दांत दे दो , तो मै तुम्हारा एहसान मानुगा।“

दांत दे दिया

हाथी ने दोबारा उसको दांत दे दिया। उस आदमी ने फिर से सारा धन शराब और जुए में उड़ा दिया और फिर से हाथी के पास दांत मांगने के लिए पहोच गया।

वह हाथी से बोला-“ तुमने जो दांत दिया उससे मेरे सभी काम पुरे नहीं हो सके। अगर तुम मुझे अपना दूसरा दांत भी दे दो तो मेरे सारे कष्ट दूर हो जायेंगे। “ हाथी ने उस पर दया करते हुए दूसरा दांत भी दे दिया।

लालची आदमी ने अपने स्वार्थ के पूरा होने पर भी हाथी के त्याग को नहीं समझा आदमी जैसे ही जंगल से बहार जाने लगा, सारी पृथ्वी हिलने लगी। धरती इस पापी के बोझ को नहीं समझ पा रही थी। धरती जगह-जगह पर फटने लगी। वह दुष्ट पापी को अपने में समेटना चाहती थी। ताकि वह लालची आदमी फिर से अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए कोई पाप न करे।

शिक्षा: स्वार्थी व्यक्ति कभी भी संतुष्ट नहीं होते है। इसलिए पृथ्वी भी उनका बोझ नहीं उठा सकती है।

shikshaprad kahaniyan

7 दुष्ट राजकुमार

एक बहोत दुष्ट स्वाभाव का राजकुमार था। वह सबको तंग करता,सभी से कड़वा बोलता, सभी का अपमान करता था। उसे दूसरो को निचा दिखाने में बहोत ख़ुशी होती थी। उसे कोई भी पसंद नहीं करता था। सभी लोग उसे दुष्ट राजकुमार कहते थे।

एक बार वह अपने सेवको के साथ नदी पर नहाने के लिए गया। अचानक आसमान में बहुत काले बादल छा गए। चारो तरफ अँधेरा छा गया। कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था। सेवक राजकुमार को वही छोड़कर किनारे पर आ गए।

सेवक राजमहल पहुचे

सेवक राजमहल पहुचे, तो राजा ने सेवको से पूछा-“ मेरा पुत्र कहा है। “ उन्होंने कहा-“ महाराज, हमें नहीं मालूम। सब जगह अँधेरा छा गया था, हम राजकुमार को नहीं देख पाए। हो सकता है, राजकुमार नदी मै तैरते आगे निकल गए हो।“ राजा ने सभी सेवको को याग्या दी की शिग्र ही राजकुमार को ढूंढा जाए।

उधर राजकुमार नदी के तेज बहाव में बहता हुआ बहोत दूर निकल गया। नदी में उसे एक पेड़ का बहता हुआ ताना मिल गया। उसने उसे पकड़ लियाऔर उस पर बैठ गया। इशी प्रकार बहते-बहते एक साँप, एक चूहे और तोते ने भी उस पेड़ की डाली को ऊपर चढ़ गए। और चिल्लाने लगे बचाओ-बचाओ! नदी के किनारे एक तपस्वी,तपस्या कर रहे थे। उन्होंने उनकी आवाज सुनी।

तपस्वी ने जान बचाई

वह दौड़ कर गए और उन्हें देख कर बोले-“ डरो नहीं,मै आ रहा हु।“ तपस्वी नदी में कुध गए और पेड़ के तने को खीच कर किनारे ले गए। फिर वह सबको अपनी कुटिया पर ले गए और कुछ खाने पिने के लिए दिया। उन सबको कुछ गर्मी मिले,यह सोचकर उन्होंने कुटिया के एक कोने में थोड़ी सी आग भी जला दी।

राजकुमार तपस्वी से नाराज हो गया की उन्होंने पहले सब जानवरों को ही खाने को क्यों दिया। मुझे क्यों नहीं दिया। तपस्वी ने मेरा अपमान किया है।

तपस्वी ने कुछ दिनों तक उन्हें अपने पास रखा। जब वह स्वस्थ होकर घर वापिस जाने लगे, तब साप ने तपस्वी को धन्यवाद देते हुए कहा  की आपने मेरी जान बचाई है। मै आपको सोने के सो सिक्के दूंगा। तोते ने कहा की मै आपको चावल दूंगा। चूहा बोला-“ महाराज, जब आप मेरे घर आयेगे, तब मै आपका बहोत स्वागत करूँगा। “ दुष्ट राजकुमार तो कोई एहसान मानने वाला नहीं था। उसने मन-ही-मन सोचा,जब यह मेरे पास आयेगे तब मै इसे जान से मरवा दूंगा।

कुछ समय बाद दुष्ट राजकुमार राजा बन गया। तपस्वी ने सोचा की चलकर राजकुमार को बधाई दी जाए।  तपस्वी कुछ फूल लेकर राजा को बधाई देने के लिए चल पड़ा।

राजा फूलो से सजे हाथी पर बैठकर अपने शहर में घूम रहा था। उसने तपस्वी को आपनी और आते हुए देखा, तो उसने अपने सैनिको से कहा-“ इस तपस्वी को पकड़कर मारते हुए,सारे शहर में घुमाओ। “ सैनिको ने तपस्वी को मारते हुए सारा शहर घुमाने लगे। तपस्वी सबसे पूछने लगा की मेरा कसूर तो बताओ? तभी एक बुध्धिमान आदमी ने तपस्वी से सारी बाते बताने के लिए आग्रह किया। तपस्वी ने नदी से राजकुमार को बहार निकलने से लेकर अंत तक की सारी बाते बताई।

जिसने भी यह सारी बाते सुनी,वही बोला-“ जो भलाई के बदले इस तपस्वी के साथ इतना अत्याचार कर रहा है, वह हमारी क्या भलाई करेगा।“

सारे शहर में यह बात फैल गई। सभी अपने-अपने घरो से निकल आये। सभी गुस्से में थे। उन्होंने राजा पर जूते,पत्थर, तीर इत्यादि से हमला कर दिया और राजा को मार डाला। उसका मुकुट भी उतार लिया।

सभी ने तय किया की अब वह तपस्वी को ही राजा बनायेगे। इस प्रकार वह तपस्वी राजा बन गया।

तपस्वी, दुष्ट राजकुमार के पास आने के पहले सभी को परखने के लिए साप,तोता और चूहे के पास भी गया था। साँप ने तपस्वी को सोने के सौ सिक्के दिए थे। तोते ने तपस्वी को बहोत सारे चावल दिए थे। चूहे ने तपस्वी का स्वागत करते हुए,उन्हें बहोत साडी वस्तुए भेट की थी।

राजा बनने के बाद तपस्वी ने तीनो को बुलाया । साँप के लिए उसने सोने का एक बहुत बड़ा घर बनवाया। चूहे के लिए एक बहोत सुन्दर बिल बनवाया और तोते के लिए सोने का एक बहोत सुन्दर पिंजरा अपने महेल में बनवाया ताकि तीनो सुरक्षित अवं आराम से रह सके।

इस तरह तपस्वी  राजा बनने के बाद अपनी प्रजा के सुख दुःख का ध्यान रखते हुए महल में रहने लगे।

सिक्षा: जो हमारे लिए अच्छा करता है,उसका एहसास हमें नहीं भूलना चाहिए।

shikshaprad kahaniyan

8 मोतियों का हार

एक बार एक रानी स्नान करने के लिए बगीचे स्थित तालाब में जाने लगी। रानी ने अपना मोतियों का हार उतारा और अपनी दासी को सम्भाल कर रखने के लिए दे दिया गया। उस तालाब के पास एक पेड़ था, जिस पर कुछ बन्दर रहते थे। एक बंदरिया यह सब बहोत ध्यान से देख रही थी। जब बंदरिया ने देखा की रानी स्नान करने के लिए चली गई और दासी बैठी-बैठी सो गई, तब उसने चुपके से हार को उठाकर पेड़ की खोल में छुपा दिया।

जब दासी की नींद खुली, तो उसने देखा की हार वहा नहीं है। वह डर गई और जोर-जोर से चिल्लाने लगी-“ हार खो गया, हर खो गया” ।

सभी सैनिक वहा इकठ्ठे हो गए और अन्य दसियो के साथ मिलकर हर ढूढने लगे पर हार नहीं मिला।

राजा ने सभी सिपाहियों को आदेश दिया –“शीघ्र ही चोर का पता लगाया जाए” ।

सिपाही हार और चोर को ढूंढने के लिए आस-पास के सभी गावो में सभी व्यक्ति से हार के बारे में पूछने लगे। इसी भाग दौड़ मै सिपाहियों ने एक मासूम आदमी को चोर समझ कर पकड़ लिया और उसे राजा के पास महल में ले गए।

डर के कारन

वहा पहोच कर उस मासूम आदमी ने सोचा की अगर मै हा कर दू तो यह शायद मुझे छोड़ देंगे, नहीं तो यह मुझे मार देगे। राजाने पूछा-“हार तुमने चुराया है?”

मासूम आदमी बोला-“ जी महाराज । “राजा ने पूछा-“ अब हार कहा है?” मार से बचने के लिए मासूम आदमी ने झूठ बोला की उसने हार व्यापारी को दे दिया है। राजा ने व्यापारी को दरबार में बुलाया और पूछा-“ तुमने इस आदमी से हर ख़रीदा है?” वो वहेपारी भी मार से बचने के लिए बता दिया, “ जी हा महाराज! “ राजा ने पूछा-“ हार कहा है? “व्यापारी ने कहा-“ मैंने पुरोहित को दे दिया। “राजा ने पुरोहोत को बुलवाया।

उसने भी डर के कारन कहा-“ मैंने एक गायक को दे दिया है। “गायकों को दरबार में बुलाया और पूछा तो उसने कहा-“ मैंने हार नर्तकी को दे दिया है। “ नर्तकी को बुलाया गया तो नर्तकी ने राजा से कहा- “ मुझे किसी ने हार नहीं दिया ।“ इसी पुछ्ताज में शाम हो गई, तो राजा ने मंत्री को बुलाया और चारो को उसके हवाले करते हुए कहा की पता लगाओ असली चोर कौन है। यह कहकर वह महल में चला गया।

मंत्री की बुध्धि बेस्ट

बुध्दिमान मंत्री ने सोचा की हार तो बगीचे में खोया है और वहा इतना पहेरा है की कोई न तो अन्दर जा सकता था, न ही बाहर आ सकता था। मुझे लगता है, इनमे से कोई चोर नहीं है। यह लोग केवल मार के डर के कारन से एसा कह रहे है। उसने सोचा बगीचे में बहुत सारे बन्दर है, हो सकता है किसी बन्दर ने हार ले लिया हो।

अगले दिन मंत्री ने लाल रंग की नकली मोतियों की बहुत सारी मालाये बगीचे में इधर-उधर बिखेर दी और छिप कर बैठ गया। बंदरो ने मालाये देखि, तो बे एक- एक कर मालाये अपने गले में पहनने लगे । पर एक बंदरिया अपनी जगह से नहीं हिली। वह तो छुपाया हुआ हार की रखवाली कर रही थी। जब सभी बंदरो को उसने हार पहने देखा तो उसे जलन होने लगी। उसने पेड़ की खोल में से मोतियों का हार निकला और गले मै पहनकर बहुत घमंड से सबको अपना हार दिखाने लगी।

हर देखकर मंत्री ने बंदरिया को पकड़वा कर हर ले लिया । मंत्री हार लेकर राजा के पास पहोचा और उसे साडी घटना बताई।

राजा ने हार ले लिया और बुध्धिमान मंत्री की प्रशंशा करते हुए कहा- “ अगर तुम्हारे जैसा बुध्धिमान मंत्री मिल जाए तो सभी समस्याओ का समाधान मिलता रहेगा।“

सिक्षा: झूठ घमंड व्यक्ति को नष्ट कर देता है।

shikshaprad kahaniyan

9 उत्तम गुण

वाराणसी में बहुत ही गुणी और शक्तिशाली राजा ब्रह्मदत्त राज्य करता था। सभी उसके गुणों, न्याय एवं नेक कामों के कारण उसका बहुत सम्मान करते थे और उस पर पूरा विश्वास करते थे।

राज के मंत्री भी राजा के समान बहत नेक और न्यायप्रिय थे। सभी मिलकर किसी भी काम को पूरा कर लिया करते थे। वहां कोई भी आपस में नहीं लड़ता था और न ही कोई चोरी होती थी। इसलिये उनके दरबार में कोई भी शिकायत लेकर नहीं आता था। सारी प्रजा सुखी थी।

एक दिन राजा ब्रह्मदत्त ने सोचा, राज्य में बहुत शांति रहती है। दरबार में कोई शिकायत लेकर नहीं आता है। मैं शहर में जाकर सभी से मिलता हूं और पूछता हूं कि क्या सभी सुख से हैं या मेरे डर के कारण शिकायत नहीं करते हैं। यह सोचकर राजा शहर में भ्रमण के लिये निकल गया। उसे ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं मिला जो दुःखी हो या किसी को राजा से कोई भी शिकायत हो। सभी ने राजा की बहुत प्रशंसा की और उनके खिलाफ किसी ने भी कुछ नहीं बोला। राजा इस बात पर बहुत आश्चर्यचकित हुआ।

पडोशी देश के राजा मलिक

पड़ोसी देश ‘कौशल देश के राजा का नाम मलिक था। वह भी ब्रह्मदत्त की तरह बहुत ही न्यायप्रिय और शांतिप्रिय थे। उसके देश के लोग भी उसका बहुत सम्मान करते थे। ब्रह्मदत्त के समान वे भी अपने मन के संदेह को दूर करने के लिए देश में भ्रमण के लिये निकले। उन्हें भी अपने देश में कोई भी व्यक्ति दुःखी नहीं मिला। घूमते-घूमते दोनों राजा अपने-अपने देश की सीमा पर

पहुंच गये। वहां का रास्ता इतना छोटा था कि दो रथ एक साथ नहीं निकल सकते थे।

‘कौशल देश’ के राजा मलिक के सारथी ने राजा ब्रह्मदत्त के सारथी को कहा-“तुम अपना स्थ पीछे कर लो।” राजा ब्रह्मदत्त के सारथी ने उत्तर दिया-“तुम्हें पता नहीं वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त मेरे रथ पर बैठे हैं। तुम अपना रथ पीछे करो। ‘राजा मलिक’ के सारथी ने भी कहा-“कौशल देश के राजा मलिक मेरे रथ पर बैठे

सारथी पूछता

राजा ब्रह्मदत्त का सारथी सोच में पड़ गया कि यह भी राजा है, अब क्या किया जाये? उसके दिमाग में एक विचार आया कि क्यों न इनकी उम्र पूछी जाये। जिसकी उम्र कम होगी वही अपने रथ को पीछे कर लेगा। उसने राजा की उम्र पछी तो दोनों राजाओं की उम्र एक समान ही थी। अब ब्रह्मदत्त के सारथी ने राजा मलिक की सेना, सम्पत्ति, राज्य और प्रसिद्धि आदि के विषय में पूछा, तो वह भी दोनों की एक जैसी ही थी।

राजा ब्रह्मदत्त के सारथी ने सोचा, “अब क्या किया जाये?” सब कुछ तो एक ही समान है। अब उसने पूछा- आपके राजा दोषी को कैसे सजा देते हैं?”

राजा मलिक के सारथी ने उत्तर दिया- मेरे राजा क्रूर व्यक्ति को क्रूरता से, दुष्ट व्यक्ति को दुष्टता से तथा दयालु व्यक्ति को दयालुता से सजा देते हैं। मेरे राजा जैसा कोई राजा नहीं है। इसलिये तुम अपना रथ पीछे कर लो।”

वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के सारथी ने जब यह सुना तब वह बोला-“मेरे राजा क्रोध नहीं करते। बुराई आराम से सुनते हैं और बराई को अच्छाई में बदलने की कोशिश करते हैं। झूठ को सच से समाप्त करते है। लोभी को लोभ से नहीं, उसकी सहायता कर उसका लोभ दूर करते हैं। इसलिये तुम ही अपना रथ हटा लो और हमें रास्ता दो।”

यह सुनकर राजा मलिक और उनके सारथी ने रथ से उतरकर राजा ब्रहादत को प्रणाम किया और अपने रथ को पीछे कर राजा ब्रह्मदत्त को रास्ता दिया।

शिक्षाः बुराई को बुराई से नहीं बल्कि अच्छाई से खत्म किया जा सकता है।

shikshaprad kahaniyan

इन्हें भी पढ़े : होशियार तोता बाल कहानी

इन्हें भी पढ़े :

0 thoughts on “shikshaprad kahaniyan”

Leave a Comment