top 10 moral stories in hindi

दोस्तों आज में आपके लिए top 10 moral stories in hindi लेके आया हु में आशा करता हु की ये moral kahaniya आप सबको बहोत पसंद आएगी

top 10 moral stories in hindi
1.मजदूर का घर
2.एक ईमानदार किसान
3.लालची नोकर रामू
4.आलसी बेटा की कहानी
5.महेनत का फल hindi kahani
6.बचत का महत्व:
7.आजादी की तासीर
8.वरदान या अभिशाप
9.कुमार की कहानी
10.बेटे होने का लालच

moral kahani 1 (one)

मजदूर का घर (moral kahaniya in hindi)

एक गाव में रामजीभाई नाम का एक व्यक्ति आपनी पत्नी के साथ रहता था। वो जिस गाव में रहता था। उस गवाका सबसे गरीब व्यक्ति वाही था। वो मजदूरी करके थोड़े बहोत पैसे ही कम पाता था। उसके पास रहेने को ढंग का घर नहीं था। खाने को दो समय का खाना नहीं था। और न ही अच्छे अच्छे कपडे थे,गाव वाले रामजीभाई और उनकी पत्नी की जरा भी इज्जत नहीं करते थे। जिस कुए से बाकी गाव वाले पानी लेते थे। अगर उस कुए पानी लेने रामजीभाई या उसकी पत्नी चली जाती थी। तो सभी उन्हें भगा दिया करते थे।

top 10 moral stories in hindi
top 10 moral stories in hindi

एक दिन रामजीभाई की पत्नी बहोत उदास होके दयाल राम से बोली
रामजीभाई की पत्नी: हमारी क्या गलती है जो हमारे गाव वाले ऐसा वर्ताव करते है। हमने तो कभी किसी का बुरा नहीं किया।

रामजीभाई अपनी पत्नी को समझाते हुए कहा।


बोला रामजीभाई: अरे तुम चिंता क्यों कराती हो। में हु ना तुम देखना एक दिन यही गाव वाले हमसे मिलाने के लिए लाइन लगा देंगे। मजदूरी करके उतने पैसे नहीं कम पा रहा हु, जितना बाकी कम लेते ह। लेकिन तुम देखना एक ना एक दिन हमारा भी सम्मान होगा। दयाल राम दिलका बहोत ही अच्चा इंसान था। वो कभी किसी के साथ बेईमानी नहीं करता था। यही उसकी सबसे बड़ी खूबी थी।

एक रात जोर की आंधी आई। दयाल राम का घर कच्चा घर था। इसलिए उसे दर लगने लगा की कही इसका घर पानी के बहाव के साथ कही बह न जाए। दयाल राम और उसकी पत्नी ने कुछ जरुरी सामान आपने हाथो में उठा लिया और पास ही अपने भाई के घर चलने लगे। दयाल राम का भाई का घर पक्का घर था। इसलिए रामजीभाई ने सोचा जरुरी सामने उसके घर ही रख देते है। दयाल राम सामान हाथ में लेकर आपने भाई के घर आया। रामजीभाई के साथ उनकी पत्नी भी आई।

रामजीभाई आपने भाई को आवाज लगाया, “भाई निचे आ जाओ कुछ काम है। रामजीभाई का भाई निचे आया। और बोला, “हा क्या हुआ! इतनी बारिश में यहाँ क्यों आये हो।” रामजीभाई कहेता है भाई, “तुम्हे मेरे घर का हाल तो पता ही है। सरे सामान पानी के साथ बह ना जाए इसी लिए में कुछ अपना जरुरी सामान तुम्हारे घर पर रखना चाहता हु। ये सुनकर दयाल राम कभी बोला, “क्या! तुम्हारे सामान मेरे घर पर नहीं नहीं मेरी पत्नी मुझे बहोत दाटेगी में नहीं रख सकता तुम्हारा सामान तुम जाओ आपने घर ही रहो। रामजीभाई का भाई गुस्से में आपने घर के अन्दर चला गया।

अपने घर आ गए

वो रामजीभाई और उसकी पत्नी दु:खी होकर वापस अपने घर आ गए। बारिश बहोत जोर से हो रही थी। इसलिए रामजीभाई और उसकी पत्नी आपने सामान और घर की रखवाली करने के लिए पूरी रात जागे रहे। सुबह हुई अब तक बारिस बंद हो चुकी थी। अब ऐसी बरसात की स्थिति में रामजीभाई को कोई काम भी नहीं मिल पा रहा था। कुछ महीने इसी तरह बित गए।

top 10 moral stories in hindi
top 10 moral stories in hindi

एक बार रामजीभाई के गाव में शहर की कुछ आमिर व्यक्तियोने मेला लगवाया। उन लोगो ने वहा एक सप्ताह का मेला लगवाया। सभी आमिर वहेपारी बड़ी बड़ी गाडियों में गाव में मेला देखने आये। एक व्यपारी अपनी गाड़ी से गाव तक आ गया। अचानक जोर जोर से बारिस होने लगी। उस व्यापारी की गाडी कीचड़ में फस गयी। वो बहोत कौशिश किया लेकिन उसकी गाडी कीचड़ से नहीं निकली। बारिश बहोत तेज हो रहि थी। गाव के कुछ लोग वहा से गुजर रहे थे तो व्यापारी ने उसे मदद मांगी। सभीने कहा इतनी बारिश में हम क्यों मदद करेंगे। एसा कह कर सभी वहा से चले गए। लगातार बारिश हो ही रही थी। व्यापारी जैसे ही बड़ी जोर से आवाज देके बुला रहा था। सभी उसकी मदद करने से इंकार कर रहे थे। रामजीभाई सभी जगहों से काम मांगकर निराश हो कर घर लौट रहा था।

बारिस बहोत तेज हो रहि थी। इसलिए वो दोडता हुआ घर की और जा रहा था। तभी उसने देखा एक गाड़ी कीचड़ में फसी हुई थी। उसे मुसीबत में देख कर रामजीभाई गाडी के पास आया। और गाडी को कीचड़ से निकालने में उस व्यपारी को मदद करने लगा। लेकिन गाडी के चक्के कीचड़ में उंदर तक फसे हुए थे। रामजीभाई कहेता है, “साहब गाड़ी के चक्के उंदर तक फस गए है। में चक्के के पास से सारा कीचड़ हटाता हु। आप गाडी निकालने की कौशिस करे। थोड़ी मसक्कत करने के बाद गाड़ी के चक्के कीचड़ के बहार निकल गए। गाडी थोड़ी आगे तक गई रामजीभाई इसे देख रहा था। तभी अचानक उस गाड़ी से निचे उतर कर रामजीभाई के पास आया।

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top 10 moral stories in hindi

वो शेठ रामजीभाई से बोला: “हेल्लो तुम कौन हो मेरा नाम दलजीत सेठ है। में शहर में व्यापार करता हु।


रामजीभाई उस व्यापारी को देख करा थोडा सा घबरा गया।


रामजीभाई बोलता है: जी मेरा रामजीभाई है।” में कई सालो से इसी गाव में रह रहा हु।
सेठ वहेपारी: अच्चा वैसे तुम बहोत अच्छे इंसान हो। पिछले आधे घंटे से में यही फसा था। किसीने मेरी मदद नहीं की सिर्फ तुमने मेरी मदद की तब जाकर में निकल पाया। में यहाँ मेला देखने आया था।

रामजीभाई: जी कोई बात नहीं। दूसरो की मदद करना तो हमारा फरहज है।

अब बारिश रुक चुकी थी रामजीभाई वहा से जाने लगा था। तभी सेठ ने उन्हें रोका उसने कहा
सेठ: मुझे अपने घर नहीं ले जाओगे क्या?
रामजीभाई: नहीं साहब मुझ जैसे गरीब के घर आकर आप क्या करोगे। मेरे घर में चारो और पानी ही पानी भरा हुआ है। आप मेला देखने जाइये में घर जाता हु।
सेठ: नहीं नहीं अब तो में एक बार तुम्हारे घर चल के ही रहूँगा।
बोले रामजीभाई: जी अब आप इतना कह रहे है। तो चलिए

रामजीभाई सेठ को आपने घर लेकर आया। रामजीभाई की पत्नी पानी से बाख कर एक और बैठी थी। रामजीभाई कहेता है देखो साहब आये है हमारे घर जाओ कुछ खाने को लेकर आओ। दलजीत दयाल राम का घर देखकर बहोत उदास हो गया। दलजीत कहेने लगा तुम क्या काम करते हो। रामजीभाई कहेता है। साहब क्या बताऊ आपको में तो कबसे काम की तलाश में हु। कोई काम ही नहीं देता। इधर उधर से कुछ ढूढ़कर कुछ मझदुरी का काम कर लेता हु।

पर बारिश की वजसे अब वो भी बंध है। तब रक् रामजीभाई की पत्नी एक कटोरी में एक गुड का ठेला लेकर आई ओए बोली साहब हमारे घर में अब यही बचा है। कृपया इसे ही खा ले दलजीत कहेता है हाहा क्यों नहीं। दलजीत रामजीभाई से बोला ह तो तुम्हे कोई काम नहीं ,इल रहा है। अगर टीम चाहो तो में तुम्हे काम दे सकता हु।

बोला रामजीभाई

ख़ुशी से बोला रामजीभाई क्या! क्या सच में आप मुझे कम देंगे। हा शहर में मेरे पास भोत से कम होते है। सोच रहा था किसी ऐसे व्यक्ति को अपने साथ रख लू जो महेनती और इमानदार हो तुम्हे देख कर मिझे ऐसा लगता है की तुम ये दोनों गुण है। रामजीभाई कहेता है साहब कैसे कम करना होगा कहा काम करना होगा। आप ये सब मुझे बता दीजिये। में आपके साथ काम करने के लिए तैयार हु। कोई जरुरत नहीं इस घरमे रहेने का कुछ ही दिनों में में तुम्हे लेने आऊंगा। कल से तुम मेरे साथ शहर में काम करोंगे और वाही रहोगे। में तुम्हे नया घर दिलवा दूंगा।

यह सुनकर रामजीभाई और उसकी पत्नी दोनों बहोत खुश हुए। रामजीभाई पुरे गाव में घूम घूम कर इश ख़ुशी को बाटा। गव्वालो को विश्वास नहीं हो रहा था की रामजीभाई सच बोल रहा है। कुछ दिनों बाद सेठ आपनी गाड़ी लेकर गाव आया। और रामजीभाई के घर के पास रुका। सेठ कहेने लग रामजीभाई सारा सामान तैयार है न चलो चलते है। रामजीभाई और उनकी पत्नी सरे सामान लेकर सेठ की गाड़ी में बैठ गए। गाड़ी चल पड़ी पुरे गाव वालोका ध्यान उन्ही पे था।

दलजीत रामजीभाई और उनकी पत्नी को शहर लेकर आया। उसके बाद उसने उन दोनों को एक घर भी दिया रामजीभाई सारे काम अच्छे से समझ गया था। अब वो दलजीत के साथ काम करने लगा। रामजीभाई का घर बहोत ही सुन्दर था। और रामजीभाई अब पैसे भी अच्छे से कम लेता था। धीरे धीरे सभी गाव वाले रामजीभाई और उनका घर को देखने के लिए शहर आने लगे जिस भाई ने रामजीभाई का सामान अपने घर पे रखने से मन कर दिया था। अब वो रामजीभाई को भाई भाई कहने से नहीं थकता था।

रामजीभाई ने आखिर में अपनी ईमानदारी से वो सबकुछ पा लिया जो उसे अबतक नहि मिला था।

moral kahani 2 (two)

top 10 moral stories in hindi
एक ईमानदार किसान

1एक गांव था। जहा एक गरीब किसान का भी घर था। वो किसान बहुत ही ईमानदार और बहोत महेनती आदमी था। वह अपने छोटे से खेत में काम करता और बहुत ही खुश रहता था। पूरे गांव में किसान की इमानदारी के बहुत ही चर्चे थे। उसका एक दोस्त था जो उस गांव के राजा के यहां सिपाही का काम करता था। वह किसान से उसके घर रोज मिलने आता था।
एक बार राजा ने अपने दरबार में सोचते हुए एक बात बोला।

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कि उसके बगीचे में काम करने वाला एक अच्छा सा कारीगर चाहिए जो उसके बगीचे के पेड़ पौधों और फूलों का ध्यान रख सके राजा का यह ऐलान सुनकर किसान के दोस्त सिपाही ने सोचा। कि यही मौका है किसान से मित्रता निभाने की मैं उसे यहां बगीचे में काम पर लगवा दूंगा, और उसका वह मेरा साथ ही बना रहेगा और किसान का भला हो जाएगा। यह सोचकर उसने राजा से कहा। कि महाराज मैं आपके लिए एक ऐसे आदमी को लेकर आऊंगा जो यह काम अच्छे से कर लेगा। तभी राजा ने उस सिपाही को आदेश दिया कि जाओ उसे कल से ही बगीचे में काम करने के लिए कह दो।

उसी वक्त वह सिपाही अपने दोस्त किसान के घर पहुंच गया। और उसने किसान को बगीचे के काम की सारी बात बता दी और किसान ने भी काम करने के लिए खुशी-खुशी हां कर दिया। और अगले ही दिन अपने दोस्त के साथ राजमहल पहुंच गया सिपाही उसे राजा के सामने लेकर आया और राजा ने उस किसान को बगीचे की पूरी देखभाल का काम सौंप दिया और कहा कि तुम अगर पूरी इमानदारी के साथ काम करोगे तो तुम्हें 50 सोने की मुद्राएं हर महीने दूंगा किसान खुशी-खुशी बगीचे में काम करने के लिए हां कर देता है। और वह उसी वक्त से बगीचे में काम करने लगा किसान बगीचे में बहुत दिन लगा कर काम करता था।

कुछ दिन बीत गए किसान ने बगीचे को बहुत सुंदर वह हरा-भरा बना दिया राजा को उसका काम बहुत पसंद आया एक दिन किसान बगीचे में कुछ खुदाई कर रहा था। तो उसने जमीन के नीचे कुछ महसूस किया तो उससे और खुदाई की तो देखा वहां नीचे एक बड़ी सी संदूक थी। किसान ने वह बंदूक बाहर निकाली और खोलकर देखी तो क्या देखा वह सोने और चांदी से भरी हुई थी।

यह देखकर किसान बहुत खुश हुआ। और अपनी ईमानदारी दिखाते हुए वह राजा के पास पहुंचा और राजा को सारी बात बता दी। राजा किसान की इमानदारी देखकर बहुत खुश हुआ और उसके साथ कहा वहां गया जहां किसान ने खजाना निकाला था। राजा ने देखा तो वहां यह खजाना तो हमारे पुरखों का है। हम वर्षों से इसकी तलाश करें थे यह खजाना देखकर राजा बहुत ही खुश हो जाता है। और अगले ही दिन राजा ने उस किसान को पूछा कि बोलो तो मैं क्या इनाम चाहिए किसान बोला मालिक मुझे कुछ नहीं चाहिए। मेरे पास जो भी है मैं उसी उसी में खुश हूं। राजा उसकी इतनी अच्छी बात सुनकर और ज्यादा खुश हो गया और उसने किसान को अपना मंत्री बनाने का फेसला किया और कहा ये मेरा हुक्म है। तो किसान ने रजा की बात मन ली और रजा का मंत्री बन गया।

तो दोस्तों सबसे बड़ी ईमानदारी ही है। जिससे एक गरीब किसान से राजा का मंत्री बन गया।

moral kahani 3 (three)

लालची नोकर रामू


लालची नौकर एक छोटे से गांव की कहानी है। एक गांव में शांताराम और शांताबाई नाम के दो लोग रहते थे। उनको एक बेटा था। पर नौकरी शहर में होने के कारण वह अपने मां-बाप के पास नहीं रह सकता था। एक दिन बेटा रमेश बोला माँ पिताजी तुम भी मेरे साथ शहर चलो ना हम वही साथ रहेंगे। इस पर शांताराम बोले नहीं बेटा हम नहीं रहेंगे मुझे ये खूबसूरत गांव छोड़कर कहीं नहीं जाना, यही हमारे सब रिश्तेदार हैं।

और यही हम रहेंगे इस पर रमेश बोला पर आप मेरे साथ चलते तो अच्छा होता, बेटा तुम हमारी फिक्र मत करो हम बड़े आराम से रह लेंगे। और हमारे साथ हमारा नौकर रामू भी है। जो हमारी देखभाल करेगा तुम अब सिर्फ अपनी नौकरी के बारे में सोचो और खुद का ख्याल रखना. हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ सदैव रहेगा यह सुनते ही रमेश अपने मां बाप का आशीर्वाद लेकर शहर की ओर चला गया।

लालची नोकर रामू
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अब घर में शांताराम और शांताबाई अकेले रहते थे। और साथ में उनका नौकर रामू रामू घर का सारा काम करता था। जैसे साफ-सफाई पानी भरना, खाना पकाना इत्यादि रामू कई सालो से उनके पास काम कर रहा था। इसलिए शांताराम और शांताबाई उस पर पूरा भरोसा करते थे। रामू दोनों की बड़ी सेवा करता था। और फिर अपने घर चला जाता था। घर जाने के बाद रामू की पत्नी कहती हैं। आजकल तुम्हें आने में बड़ी देर हो रही है। रामू बोला क्या करू भगवान! आज कल घर का सारा काम मुझे ही करना पड़ता है। उनका बेटा नोकरी के लिए शहर चला गया है। अब दोनों बेचारे अकेले है।

इस पर रामू की पत्नी झट से बोली क्या अकेले मतलब बिलकुल अकेले, रामू बोला जी हां सच में अकेले रामू की पत्नी आगे बोली, अगर वह अकेले हैं, तो कुछ अच्छे-अच्छे पकवान बनवाकर लाओ उन्हें क्या पता चलेगा बहुत दिन हो गए है अच्छा खाना खाए। इस पर रामू बोला ठीक है, भागवान कल जरूर लाता हूं। अगले दिन रामू काम पर गया घर का सारा काम किया और अंत में अपनी पत्नी के लिए चोरी छुपे अच्छे व्यंजन बनाए और घर ले आया। फिर यह सिलसिला चलता रहा देखते ही देखते रामू की पत्नी की लालच बढाती गई। उसने खाने के अलावा घर की चीजे चुराने का आश्वासन दिया। फिर एक दिन रामू ने चुपकेसे चम्मच चुराया और दुसरे दी लोटा चुराया बर्तन और तीसरे दिन कोई और बर्तन यह सिलसिला यूं ही चलता रहा।

एक दिन शांताराम उसके काम से घर वापस आए और अपना लोटा ढूंढने लगे। अरे रामू वो लोटा कहा रखा रामुने जवाब दिया मालिक यही कही होगा, शांताराम ने लोटा बहोत ढूढा लेकिन उन्हें कहीं नहीं मिला। अगले दिन शांताबाई चम्मच ढूढ़ रही थी लेकिन उसे भी वह नहीं मिला, तब शांताबाई ने पूछा जरूर कुछ गड़बड़ है। यह सारी चीजें अपने आप कहां जा सकती हैं। शांताबाई ने शांताराम से कहा अजी सुनते हो हमारी घर की एक एक चीज गायब हो रही है। जरूर कुछ गड़बड़ है, इस पर बोले हा भागवान मेरा लोटा भी कितने दिनों से गायब है, जरूर गड़बड़ है।

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top 10 moral stories in hindi

अगले दिन शांताराम बाहर जाकर 3-4 बिच्छु पकड़ कर एक डब्बे में रख देता है। और डब्बे को घर के अंदर ले आता है। रामू को देखकर कहता है। रामू ये डब्बा मेरे पलंग के सिराने रख दे इसमे सोने के जेवर है। कल डब्बे को बेंक ले जाकर जमा कर देना है। आज के दिन संभालना पड़ेगा रामू वो डब्बा लिया और शाताराम के पलंग के नीचे रख दिया और अपना रोज का काम करने लगा लेकिन काम करते समय ध्यान सिर्फ उस डब्बे पर था। जैसे ही दोपहर का खाना खाने के बाद शांताराम और शांताबाई सोने के लिए तैयार हुए लालची रामू उस डब्बे की और बढा।

और उसे खोला तो उसमे से तिन बिच्छु बहार आये। ये देखकर रामू घबरा गया।इधर उधर दोदने लगा। बचाओ! बचाओ! बिच्छु सिच्छु मुझे कट लेगा। शोर से शांताराम और उनकी पत्नी जाग गई। और उन्होंने बिच्चुओको डब्बे में बंध कर दिया शांताराम बोला मुझे पूरा यकीं था। के तुम चोरी कर रहे थे। में सिर्फ तुम्हे सबक सिखाना चाहता था। तुम्हे क्या लगा हम बूढ़े हो गए है तब हमको कुछ पता नहीं चलेगा। में तो पहेले से ही समझ गया था। तुम खाना लेकर जाते थे। हमने सोचा खाना ही तो है। तो है क्या फर्क पड़ता है लेकिन दिन-ब-दिन तुम्हारा लालच बढ़ता गया। और तुम घर की वस्तुएं चुराने लगे शर्म आनी चाहिए तुम्हें “जिस थाली में खाते हो उसी में छेद करते हो” रामू को अपनी गलती का अहसास हुआ। और वह रोने लगा।

तो बच्चों क्या समझे इस कहानी से लालच करना बुरी बला है, लालच का रास्ता हमेशा बुराई की ओर जाता है।।

moral kahani 4 (four)

आलसी बेटा की कहानी


किसी गांव में एक अमीर शाहूकार अपनी पत्नी और बेटे के साथ रहता था। उनके बेटे का नाम सुमित था। सुमित बहुत ही आलसी था जबकि शाहूकार बहुत मेहनती था। वो रोज सुबह सूर्योदय से पहले शिव मंदिर जाता था। और उसके बाद वह अपने खेतों, तबेलो, और जहां जहां तक उसका काम फैला हुआ था। वहां का चक्कर लगाता था। शाहूकार अपने बेटे के आलसी पन से बहुत ही परेशान था। बेटा उठ जाओ साहूकार बोला,” मेरे साथ खेतों में चलकर कुछ काम सिख लो! बेटा:अभी नहीं पिताजी अभी मुझे सोने दीजिए। शाहूकार परेशान होकर अकेला ही खेतों में चला गया,

top 10 moral stories in hindi
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कुछ समय बाद शाहूकार की तबीयत बहुत ही खराब रहने लगी। यानी बीमार बीमार हो गया, और कुछ ही दिनों में वह मर गया। शाहूकार के मरने के बाद भी उसके आलसी बेटे ने अपने काम धंधे पर ध्यान ही नहीं दिया। जिससे उन्हें कारोबार में बहुत नुकसान होने लगा।यह देखकर भी वो नहीं माने दु:खी होकर सुमत की माँ ने अपने बेटे से कहा

माँ: बेटा हमें कारोबार में बहुत नुकसान हो रहा है।
बेटा: तो मैं इस पर क्या कर सकता हूं, मुझे कहां कारोबार की कहा समझ है। मैं तो आज तक पिता जी के साथ खेत पर भी नहीं गया।
माँ: एक काम करो दूसरे गांव में तुम्हारे नानाजी रहते हैं। उन्हें इस कारोबार की बहुत समझ है। तुम उनसे जाकर मिल लो उनके पास जरूर इसका कोई समाधान होगा। बेटा: ठीक है मां! मैं कल ही चला जाऊंगा।

अगली सुबह सुमित नाना के पास गया।
बेटा: प्रणाम नानाजी,
नानाजी: खुश रहो बेटा; बताओ कैसे आना हुआ!
बेटा: पिताजी के गुजर जाने के बाद हमें कारोबार में बहुत नुकसान हो रहा है। मां ने बताया कि आपको कारोबार की बहुत समझ है इसलिए अब आप ही मेरी परेशानी का अब कोई हल निकालिए।
नानाजी: तुम्हारी मां ने बिल्कुल ठीक कहा है बेटे मेरे पास तुम्हारी परेशानी का हल है।
बेटा: बताइए नाना जी जल्दी बताइए,
नानाजी: तुम्हें बस इतना करना होगा कि तू अपने पिता ने पिता की तरह रोज सुबह सूरज के उगने से पहले शिव मंदिर जाना होगा। और उसके बाद जहां जहां तक तुम्हारा काम फैला हुआ है। वहां जाना होगा और तुम्हें ऐसा रोज करना होगा।
बेटा: ठीक है जैसा आपने कहा मैं वैसा ही करूंगा।

अगले दिन से ही सुमित सूरज उगने से पहले उठने लगा। और सबसे पहले शिव मंदिर जाता और उसके बाद जहां जहां उनका काम फैला था वहां जाने लगा वह रोज सुबह सबसे पहले खेत जाता फिर राशन की दुकान और फिर भेसो के तबेले जाता। बहुत दिनों तक ऐसा ही चलता रहा उसे रोज-रोज काम पर आता देख मजदूर आपस में बात करने लगे।

आलसी बेटा की कहानी
आलसी बेटा की कहानी

मजदुर 1; तुमने देखा मालिक अब रोज-रोज काम देखने आने लगे हैं।
दूसरा मजदुर: हां अब लगता है हमें यह घोटाले बाजी बंद करनी पड़ेगी।
मजदुर 1: तुम सही कह रहे हो वरना हम सब पकडे जाएंगे।

धीरे-धीरे सभी मजदूरों ने देखा कि सुमित अब अपने खेतों और अपनी दुकान और तबेले की पूरी जानकारी रखता है। और रोज आता है। और पकड़े जाने से डर से मजदूरों ने घोटाला करना बंद कर दिया। घोटाले बंद होने के कारण कारोबार में नुकसान होना भी बंद हो गया। और धीरे-धीरे सुमित और उसकी मां पहले की तरह ही अमीर हो गए।

बेटा: अरे वाह देखो मां! नाना जी की सलाह से हम फिर से अमीर बन गए।
माँ: तुम ठीक कह रहे हो बेटा, तुम्हें नाना जी के पास जाकर उन्हें धन्यवाद करना चाहिए।

सुमित को मां की बात ठीक लगी नाना जी से मिलने गया

बेटा: नानाजी आपका बहुत-बहुत शुक्रिया आपने तो चमत्कार कर दिया आपकी वजह से हमारा कारोबार फिर से चल पड़ा।
नानाजी: बेटे मैंने इसमें कुछ नहीं किया इनमें सब कुछ तुमने ही किया है।
बेटा: क्या मतलब वह कैसे,
नानाजी: नुकसान तो बस तुम्हारी आलस की वजह से हो रहा था। तुम अपनी आलस की वजह से अपने कारोबार पर ध्यान नहीं दे रहे थे। इसका फायदा उठाकर तुम्हारे मजदूर काफी कारोबार में घोटाला कर रहे थे। अब क्योंकि तुम रोज काम पर जाने लगे हो तो पकड़े जाने के डर से तुम्हारे मजदूरों ने घोटाला करना बंद कर दिया। और तुम्हारा काम चल पड़ा। यह सुनकर सुमित को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने आलस करना छोड़ दिया और वह अपना कारोबार बहुत मेहनत से समाज संभालने लगा ।

इस कहानी की सीख; आलस बहुत बुरी बला है। इसलिए हमें आलस त्याग कर अपना काम समय पर करना चाहिए।

moral kahani 5 (five)

महेनत का फल hindi kahani

बहोत समय पहेले की बात है। एक बहोत बड़ा वहेपारी के घर बहोत वर्षो बाद उसकी पत्नी को बेटा हुआ। इसलिए माता पिता अपने बच्चे को बहोत लाड प्यार करते थे। अब जाहिर सा है, बहोत ही अधिक लाड प्यार से उनका लड़का बिगड़ गया था। वो बहोत ही शरारती बन गया था। जैसे जैसे वो बड़ा होता गया उनकी फिजूल खर्चे की आदत भी बढ़ती गयी, पुत्र को सुधारने के लिए माता पिता ने अनेक प्रयत्न किये। परन्तु इससे कोई लाभ नहीं हुआ। एक दिन जब पिता ने पुत्र को कहा।

पिता: बेटे मेरे पास जोभी है वो सब तुम्हारा ही तो है। लेकिन एक शर्त है, तुम्हे इस बात का प्रमाण देना होगा की तुम भी धन कम सकते हो, तब तक मेरी सम्पति में से तुम्हे एक पैसा भी नहीं मिलेगा।

top 10 moral stories in hindi
मोरल कहानी

पिता के एसा कहने से पुत्र को बहोत दुःख हुआ। उसने ये निश्चय किया! में इस बात का प्रमाण जरुर दूंगा की मै भी धन कम सकता हु,

अगले दिन वो लड़का काम की तलाश में निकल पड़ा। घुमते घुमते उसे एक सेठ के यहाँ ठेला खीचने का काम मिल गया। अनाज की बोरी अपनी पीठ पर उठाकर उसे ठेले में भरके और ठेले को खीचके दूसरी जगा लेजाना उसका काम था। दिन भर उसने कठिन परिश्रम किया। तब कही जाकर उसे को एक रुपैया मिला। घर जाकर उसने वो रुपैया उसने अपने पिता को दे दिया। घर के पिछवाडेमें एक कुआ था। पिता ने पुत्र के सामने वो रुपैया उस कुए में डाल दिया। कुछ दिन तक यही क्रम चलता रहा। प्रतिदिन पुत्र महेनत से कमाया रुपैया पिता को देता, और पिता वो रुपैया को कुए में डाल देता। एक दिन पुत्र झुंझलाया और बोल पड़ा।

पिताजी महेनत से कमाई हुई मेरी पुरे दिन की कमाई आप इस तरह कुए में क्यों डाल देते हो। पिता ने उसे समझाया में जानता हु, पुत्र तुम दिन भर सख्त परिश्रम करते हो। तब जाकर एक रुपैया कमा पाते हो। तुम्हारी महेनत की कमाई जब में कुए में फैक देता हु। तब तुम्हारा मन दु:खी हो जाता है। ये भी मै समझता हु। बेटा अब तू भी समझ गया होगा। जब तुम मेरे कमाए हुए धन को निरर्थक बर्बाद कर रहे थे, तब मेरी क्या दशा होती होगी, पुत्र को अपनी गलती का अहेसास हुआ। उसने मन ही मन निश्चय कर लिया।

अब में कभी भी धन को व्यर्थ खर्च नहीं करूँगा।

moral kahani 6 (six)

बचत का महत्व:


एक किसान था। इस बार वह फसल कम होने की वजह से चिंतित था घर में राशन 11 महीने चल सके उतना ही था। बाकी 1 महीने का राशन का कहां से इंतजाम होगा यह चिंता उसे बार-बार सता रही थी।

kishan ki kahani
मोरल कहानी

किसान की बहू का ध्यान जब इस और गया तो उसने पूछा, “पिता जी आजकल आप किसी बात को लेकर बहोत ही चिंतातुर बने हुए जा चुके थे। परेसान हो चुके थे।” तब किसान ने अपनी चिंता का कारण बहू को बताया किसान की बात सुनकर बहू ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह किसी बात की चिंता न करें, उस 1 महीने के लिए भी अनाज का इंतजाम हो जाएगा।

जब पूरा वर्ष उनका आराम से निकल गया तब किसान ने पूछा कि,” आखिर ऐसा कैसे हुआ, बहू ने कहा, “पिताजी जबसे आपने मुझे राशन के बारे में बताया तभी से मैं जब भी रसोई के लिए अनाज निकालती उसी में से एक दो मुट्ठी हर रोज वापस कोठी में डाल देती। बस उसी की वजह से बाहर महीने का इंतजाम हो गया।”

शिक्षा: इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में बचत की आदत डालनी चाहिए। ताकि किसान की तरह बुरे वक्त में जमा पूंजी काम आ सके।

moral kahani 7 (sevan)

आजादी की तासीर

जंगल में एक शेर अपनी माँ से बिछुड़ गया। और शिकारियों के जाल में फस गया। उन्होंने उसे सर्कस वालो से बेचकर मोटी रकम कमाई। सर्कस वालो ने उसे पिट पिट कर कई करतब सिखाये और जनता को दिखा-दिखाकर लाखो रुपैये कमाए।बदले में शेर को सिमित भोजन ही मिलता था। जिससे वह केवल जिन्दा ही रह सका। शेर के गले में लोहे की जंजीर और पाँव में मजबूत बेडिया लगी रहेती। ताकि वह हर समय काबू में रह सके।

प्रारंभ में वह इन जंजीर और बेडियो का गुर्राकर विरोध करता,परन्तु अपने मालिक के हाथो बेत और चाबुक से पीटकर शांत हो जाता। फिर भी रह-रह कर उसे अपना शेरपन याद आता और बिच बिच में दहाड़ भी माँरता। परन्तु इस दहाड़ में रॉब कम और करवट ज्यादा महसूस होती थी।

शेर को गुलामी की जिंदगी जीते अब पुरे पंद्रह बरस बिट चुके है। अब गुलामी,शोषण,मार-पिट और अपमान को अपनी नियति मान लिया है।

top 10 moral stories in hindi

इस बिच एक सामाजिक संगठन जिसका उदेश्य वनों के निरीह प्राणियों पर हो रहे अत्याचारों से मुक्ति दिलाना था। उनकी नजर उस शेर पर पड़ी और उन्होंने आवश्यक कार्यवाही करके शेर को उस सर्कस से छुड़ाया। उसे उन जंजीरों और बेडियो से मुक्त करवाया। मुक्ति के पश्चात भी शेर चोबीस घंटे तक वही बैठा रहा। उसे मुक्ति का भरोसा नहीं हो रहा था। और ऊपर से गुलामी की मानसिकता से मुक्ति नहीं पा रहा था।

दुसरे दिन वह स्वत: ही चलकर जंगल की और प्रस्थान कर गया। मगर न तो उसके हाथ पाँव कम कर रहे है, और न दहाड़ में वह बादशाहत। जब छोटे मोटे प्रयासोसे उसे शिकार नहीं मिला तो वह अपने पेट की आग बुझाने हेतु: पुन: सर्कस की और लौट आया। जहा उसे बिना पसीना बहाए और स्वत: ही बिना शिकार किए सिमित मात्र में भोजन मिल जाया करता था, मगर तब तक सर्कस का डेरा वहा से जा चूका था।

यह द्रश्य देखकर पहले तो वह निराश हुआ, मगर कुछ ही पालो में उसे अपने शेर होने का असली भान एहसास हुआ। बस फिर क्या था? स्वतंत्रता का भास होते ही वह स्वत: ही पीछे मुडा, दहाड़ भरी और पूंछ को फटकारते हुए जंगल की और लपक पड़ा। आज अब उसकी दहाड़ में गर्जना थी। असली शेरपण था। यही तो होती है आजादी की तासीर

moral kahani 8 (eight)

वरदान या अभिशाप

पायल और प्रतिक दोनों भाई बहन थे। पायल कक्षा दस में पढ़ती थी जबकि प्रतिक कक्षा आठ का विद्यार्थी था। दोनों पढाई में अच्छे थे। पायल को पुस्तकों से बड़ा प्रेम था। वह उन्हें संजोकर रखती और उसे पढ़कर ढेर सारी जानकारिय प्राप्त करती। उसे पत्र-पत्रिकाए भी पढने का शौक था। प्रतिक किताबो की अपेक्षा मोबाइल फ़ोन से पढाई करता था। वह पढाई के बहाने youtube,whatsaap और facebook भी चलाया करता था। कभी कभी वह बड़े लम्बे टाइम तक गेम खेलने से भी नहीं थकता था।

एक दिन जब पायल और प्रतिक पढाई करने बैठे थे। तो प्रतिक ने मोबाइल फ़ोन चला दिया। पायल का ध्यान पढाई से बंट गया। वह प्रतिक से बोली-विध्यार्थियो के लिए मोबाइल फ़ोन चलाना अच्छी बात नहीं होती। तुम इसमे अपना समय बर्बाद मत करो। किताबो से पढाई करो।”

पायल की बात प्रतिक को न जची। वह बोला-“दीदी! अब हम लोग इक्किसमी सदी में रह रहे है। यह वैज्ञानिक यूग है। इस ज़माने में यदि हम वैज्ञानिक यंत्रो का प्रयोग नहीं करेगे तो पिछड़ जायेंगे। हमें समय के साथ चलाना चाहिए।”

” मोबाइल फ़ोन बड़ो के लिए है बच्चो के लिए नहीं। इसे बहुत देर तक देखने से बच्चो की आँखे कमजोर हो जाती है।”पायल ने प्रतिक को समझाते हुए कहा।

प्रतिक ने फिर तर्क दिया, “मोबाइल फ़ोन के प्रयोग से बच्चो में स्मार्टनेस आती है। उससे दिमाग तेज होता है। इसमे गेम खेलने से तुरंत निर्णय लेने की क्षमता आती है।”

प्रतिक की बातो पर पायल को हँसी आ गई उसने कहा,” मोबाइल पर गेम खेलना कोइ स्मार्टनेस नहीं है। यह तो केवल समय की बर्बादी है। यदि खेलना ही है तो खेल के मैदान में खेलो। इससे तुम्हारी सेहत भी ठीक रहेगी।”

” मगर दीदी! मोबाइल फ़ोन में सर्च करने से हमें बहुत सी जानकारिया मिलाती है। youtube से पढाई भी कर सकते है। घर बैठे-बैठे दूर के लोगो से भी बात कर सकते है। “प्रतिक ने फिर आपना तर्क दिया।

पायल ने फिर कहा,” असली ज्ञान तो हमें पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओ से प्राप्त होता है। इन्हें पढ़ने से हमारी आँखे भी सुरक्षित रहती है। समय भी बर्बाद नहीं होता है। खुद में शुर्जनशीलता आती है। अधिक मोबाइल फ़ोन चलाना एक प्रकार का बच्चो के लिए व्यसन है।”

प्रतिक और पायल की बहस बढ़ती ही जा रही थी। वे एक दुसरे की बात मानाने को तैयार नहीं थे। तभी वहा दादाजी आ गए। वे आपने कमरे में लेटे-लेटे पायल और प्रतिक की सारी बाते सुन रहे थे। उन्होंने कहा.”देखो बच्चो! तुम दोनों अपनी-अपनी जगह पर ठीक हो। विज्ञान द्वारा हमें प्रदान की गई सारी वस्तुए न तो पूर्णरूप से लाभकारी है। और न ही हानिकारक। यह इस बात पर निर्भर करता है की हम उनका उपयोग किस तरह से करते है।”

” भला वो कैसे दादाजी? एक ही वस्तु कैसे लाभदायक भी हो सकती है ओर हानिकारक भी?”

प्रतिक का प्रश्न सुनकर दादाजी मुस्कुराने लगे। वे उदहारण देते हुए बोले, “बन्दुक एक वैज्ञानिक अविष्कार है। इसका प्रयोग हम अपनी रक्षा के लिए करते है। परन्तु कुछ लोग इससे आत्महत्या भी कर लेते है। यदि किसी भी वस्तु का प्रयोग हम समझदारी से करेंगे तो वह लाभकारी होंगा। इससे विपरीत यदि उसका प्रयोग हम मुर्खतापुर्वक करेगे तब वो हमें हानि पहोचायेगा। यही बात मोबाइल फ़ोन पर भी लागु है। हमें इसका प्रयोग जरुरत के हिसाब से ही करना चाहिए। जरुरत पूरी होने पर उसे रख देना ही बेहतर होता है।

जहा तक पढाई की बात है। तो मोबाइल फ़ोन किताबो का स्थान नहीं ले सकता। स्थाई और विस्वश्नीय ज्ञान तो पुस्तकों से ही मिलाता है। मोबाइल फ़ोन हमें उतनी ही देर चलाना चाहिए जितने से अन्य कार्य बाधित न हो। कुलमिलकर बच्चो में यह कहना चाहता हु की यदि हम इसका प्रयोग समझदारी से करते है तो यह वरदान है नहीं तो अभिशाप।

moral kahani 9 (nine)

कुमार की कहानी

कई साल पहेले दिल्लीकोता नामका एक गाव में एक महाजन रहेता था। वो महा कंजूस था। जरुरत मंदों को वो ज्यादा व्याज से पैसा उधार देता था। और फिर उन्हें बहोत सताता था। एक दिन वो रास्ते से चल के जा रहा था। उसे एक आम बेचने वाले का दुकान दिखा। कुमार ने पूछा कितने में दोंगे एक दर्जन आम, मीठे तो होंगे ना.। व्यापारी ने कहा एक डझन तिन रुपैये का ले लो बाबूजी। बहोत स्वादिस्ट है। कुमार ने कहा क्या तिन रुपैये का एक दर्जन क्यों! भाई पैसे क्या पेड़ पे लगते है। क्या, दो रुपैये दूंगा।

व्यापारी ने कहा: महाशय सबको एक ही दाम में बेच रहा हु आपको दाम बढाके नहीं बोला में, मुझे भी तो दो पैसे कमाने है, आपको यदि दो रुपैये में आम चाहिए दो मिल चल कर आगे जाइये,वहा आपको मिल जायेगा।
कुमार ने कहा: दो मिल नहीं तो चार मिल चलूँगा। तेरेको क्या? ह हा मेरे से ही पैसे एटैन की कौशिस कर रहा है।

ये कह कर वो आगे बढ़ गया। और कुछ दूर जाने के बाद उसे एक और आम बेचने वाला मिला।
कुमार ने पूछा अरे भाई कितने में दोंगे एक दर्जन आम दाम थोडा समझके बोलना बहोत दूर से आ रहा हु।
व्यापारी ने कहा बहोत मीठे आम है, महाशय दो रुपैये दर्जन आम। आम भी देखिये बाबूजी कितने बड़े है। और बहोत ही मीठे है बाबूजी!
कुमार ने कहा दो रुपैये बाप रे देने वाला हो तो कुछ भी मांगोगे क्या! इतनी लालच ठीक नहीं एक रूपी दूंगा दे दो मुझे।
व्यापारी ने कहा नहीं बाबूजी वो दाम में मुझे नहीं पोसायेगा। नुकसान हो जायेगा। कोई नुकसान उठाने व्यापर करता क्या बाबूजी। आपको यदि एक रुपैये में आम चाहिए तो दो मिल और चलिए बाबूजी। वहा आम का बगीचा है वहा पूछ लीजियेगा।
कुमार ने कहा हा हा जाऊंगा कितनी ही दूर हो में जाऊंगा। अरे बाप रे कितनी लुट मची हुई है यहाँ पर आम बेचने के लिए घर बेचना पड़ेगा क्या!

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यह कहकर वो आगे बढ़ गया। वो चलके जा रहा था। नदी के किनारे उसको आम का बगीचा दिखा। वहा उसे एक आम बेचने वाला भी दिखा।

ए भाई कितने में दोंगे एक दर्जन आम दाम थोडा समझके बोलना!
व्यापारी ने कहा: महाशय सब के लिए एक ही दाम है। एक रुपैये में एक दर्जन आम आपको दू क्या।
कुमार ने कहा एक रुपये, सो रुपैये न दू, तुम्हे अठन्नी दूंगा अठन्नी में देना है, तो दो न तो ना में क्या पागल दिखता हु, तुम बस पेड़ पे से ऐसे उतर रहे हो, और सामने बेच रहे हो। उसके लिए एक रुपैया में नै दूंगा।
व्यापारी ने कहा तो आप ही पेड़ पे चढ़ जाइये। जितना चाहिए तोड़ लीजियेगा मेंने कहा मन किया है। मैंने आपसे थोडा कहा है की मुझसे ही ले लीजिये। एक रुपैये से काम में में नहीं दे सकता आप की मरझी लेना है तो लीजिये वरना पेड़ पे चढ़ जाइये।

कुमार ने कहा चढूगा चढूगा पेड़ पे भी चढूगा, जरुरत पड़ी तो हिमालय पे भी चढ़ जाऊंगा। मेरी मरजी हा हा मुझसे ही पैसे ऐठना सोच रहा था। तुम्हारी लुट में रोक के ही दम लूँगा।
फिर कुमार अहिस्ता अहिस्ता पेड़ पे ही चढ़ गए। पेड़ पे एक आम तोडनेका वो दोनों हाथो से प्रयत्न कर रहा था। उसका पैर फिसला और वो निचे गिरा। और उसका पैर टूट गया।

फिर वेधशाला के वैध ने उसे डाटा क्यों भाई कुमार एक रुपैये के लिए सोच रहे थे। अब देखो टान्ग टूटी तो दस हजार का खर्च हुआ। वैसे तुम ज्यादा ब्याज लो तो गलत नहीं। पर और व्यापर करके दस पैसा कमाए तो तुमसे देखा नहीं जाता। कम से कम अब सुधर जाओ और सही तरीके से जीना सीखो।

तो दोस्तों चाहत अच्छी बात है पर दुराशा बिलकुल गलत। दुराशा से हमें दुःख मिलाता है।

moral kahani 10 (ten)

बेटे होने का लालच

साधना और दिनेश के घर एक और बेटी हुई थी। अब घर में तिन बेटिया थी। दोनों पति-पत्नी बहोत खुश थे लेकिन दिनेश के माता पिता खुश नहीं थे। उन्हें दुःख था की बहु को अब तक एक भी बेटा नहीं हुआ। पहेले ही दो बेटिया होने की वजसे साधना बहोत ताने सुनती थी।

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सास: अरे बेटा तो घर का कुलदीपक होता है। पर तुमने तो घर में अँधेरा ही कर रखा है। एक बेटा पैदा नहीं हो रहा तुमसे,
ससुर: बहु तुम तो बेटिया बनाने की फैक्ट्री हो तुमसे हमें एक दर्जन बेटिया नहीं चाहिए एक बेटा देदो बस।
साधना: मेरे हाथमे थोडिना है। भगवान जो दे रहे है उसे प्यार से क्यों नहीं ले लेते आप लोग बेटियों में क्या कमी है।
सास: यही कमी है की बेटी कभी बेटे की कमी पूरी नहीं कर सकती।
साधना: आप खुद भी तो किसीकी बेटी है सासुमा आपको ऐसी बाते नहीं करनी चाहिए।

लेकिन सास ससुर पर बहुकी बात का कोई असर नहीं होता है। तीसरी बेटी होने की ख़ुशी में दिनेश और साधना घर में सूरज पूजा रखने की सोचते है।

बेटा: माँ सूरज पूजा हो रही है नइ बच्ची के लिए पूजा की सामग्री और खाने का सामान तो ले आये कुछ और लाना है बाजार से…
माँ: एक बेटा ले आ अगर हो सके तो बहु से तो नहीं हो रहा
पिता: हां अपने पोते के साथ तो खेल लूँगा और में आराम से स्वर्ग जा सकूँगा।
साधना: आपको लगता है की आप मुझे ऐसे ताने मारके मेरी बच्चियों से नफरत करके स्वर्ग जायेगे!
ससुर: बहु जुबान तुम्हारी बहोत लम्बी हो गई है।
सास: अरे ज्यादा चलाओगी तो काट देंगे हा।


बेटा: माँ बाबूजी आप उसे ताने मत मारिये उसकी क्या गलती है। अगर बेटा नहीं हो रहा तो उसमे उसका क्या दोष है।
पिता: देख बेटा संभल जा तिन बेटिया हो चुकी है। अगर वो बहु पे चली गयी तो तेरा जीना हरम कर देगी।
साधना: दिन रात आपकी सेवा करती हु घर मंदिर जैसा साफ रखती हु। लेकिन आप को बस यही दिख रहा है की मुझे बेटा नहीं हो रहा।
ससुर: अरे बेटा होता तो बेटा भी दिखता न!

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दिनेश और साधना सब सुनके वे चुप रहेते है और सूरज पूजा की तैयारिया करते है। लेकिन साधना के सास ससुर किसी और की तैयारी में लगे हुए होते है।

ससुर: दिनालालकि बेटी है न वो अच्छी रहेगी।
सास: हा सही कह रहे हो आप चलो आज ही बात करने जाते है।

सास ससुर पूजा में सामिल नहीं होते और घर से बहार कही चले जाते है। पूजा ख़त्म होने के बाद जब दोनों घर पर लौट के आते है। तो दिनेश पूछता है।

दिनेश: अरे कहा थे आप अपनी पोती की सुरेश पूजा में तो शामिल होना चाहिए था।
साधना: एक बार इस बच्ची को तो गोद में उठा लीजिये आप लोग।
सास: आ अब बेटे दिनेश तुम हमारे साथ चलो एक बात करनी है।
दिनेश: कहो न क्या बात करनी है माँ!
ससुर: यहाँ नहीं करेंगे एक कमरे में चलते है। तुम में और तुम्हारी माँ!

दिनेश और साधना कुछ समझ नहीं पाते और दिनेश अपने माँ बाप के साथ एक कमरे में चला जाता है।

माँ: देखो बेटा थोडा अजिब लग रहा है थोडा बोलते हुए पर
पिताजी: पर देखो जैसे तुम हमारे बेटे हो हम तुम्हे बहोत प्यार करते है। वैसे ही हम चाहते है की तुम्हारा भी एक बेटा हो जिसे तुम बहोत प्यार करो।
बेटा: प्यार तो में अपनी बेटियों से ही करूँगा ना
माँ: हा हा करना पर बेटा बेटा होता है। जैसे तुमने हमें कामके खिलाया है। हमारे बुढ़ापे का सहारा बने हो वैसे तुमको भी जरुरत पड़ेगी ना
बेटा: अरे लडकिय भी पढ़ लेगी तो कम के खिला देंगी जमाना आगे बढ़ चूका है माँ!
पिता: अरे बेटा तुम समझ नहीं रहे हो लोग तरह तरह की बाते करेंगे की इसके पास सबकुछ है पर बेटा नहीं है।
बेटा: तो सबकुछ तो है न बस एक बेटा ही तो नहीं है ना
माँ: देखो सीधे सीधे बात करती हु बहु से बेटा नहीं हो रहा है और हम चाहते है की तुम दूसरी शादी कर लो।
बेटा: क्या?
पिता: हा हम एक लड़की भी देख आये है। बहोत सुन्दर है।
बेटा: अ साधना का क्या होगा माँ!
पिता: साधना… ह इससे तो किसी तरह छुटकारा पा ही लेंगे। बस तुम एक बार सहदी के लिए हां कर दो। फिर बेटा मिल जाएगा इस घर को,

दिनेश वहा से उठकर चला जाता है। और साधना के पास जाकर कहेता है।

दिनेश: साधना तुम अपना सारा सामान बांध लो और मइके जाने की तैयारी कर लो।

पीछे पड़े माता पिता सुनते ही खुश हो जाते है। उन्हें लगता है की दिनेश अभी से माइके भेजने को राजी हो गया है।

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साधना: पर क्यों?
दिनेश: माँ और पिताजी मेरी दूसरी शादी करवाना चाहते है।
साधना: क्या! क्या बोल रहे हो,
दिनेश: हा तुमसे तो बेटा नहीं हो रहा है ना,
साधना: अरे आप कैसी बाते कर रहे है। आप भी इन लोगो की तरह हो गए है। क्या जादू कर दिया है इन्होने आप पर
दिनेश: अब घरमे नै बहु आएगी।

साधना अब रोने लगाती है। दिनेश उन्हें रोते हुए देखकर कहेता है।
दिनेश: रोना बंध करो में भी तुम्हारे साथ चलूँगा। मेरे माँ बाप चाहते है की मेरे घर में एक नइ बहु आ जाए। तो लाने दो लेकिन उनका एक बेटा यानी की में आज गायब हो जायेगा।
माँ: बेटा क्या हो गया है तुम्हे
बेटा: अक्ल आ गयी है माँ, आपको बेटा चाहिए न माँ जो है उसमे संतोष नहीं है। तो जिसके होने से संतोष नहीं है तो वो इश घर में क्यों रहे। हम सब जा रहे है इस घर छोड़कर और रही बात दूसरी शादी की तो सुनलो अब में साधना को छोड़कर दूसरी शादी करना में सोच भी नहीं सकता नइ बहु ले आइये और बेटा बाजार में मिलता हो तो उससे भी मंगवाइये पर हम जा रहे है।

माँ और पिताजी गिदगिड़ा के बेटे को रोकते है। लेकिन वो साधना और बच्चियों के साथ चला जाता है। और जाते जाते रुक जाता है और कहेता है में आप लोगो के खर्चे के लिए पैसे भेज दिया करूँगा और आपकी देखभाल के लिए एक नौकर भी माँ पितीजी रोने लगते है। साधना की सबसे बड़ी बेटी उनके पास जाकर उनसे गले लग जाती है। मगर दिनेश उन्हें वापस अपनी तरफ खीच लेता है।

बहु से बेटा पाने की लालच में माँ और पिताजी आपने बेटे को ही खो देते है।

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